
कैलाश पर चौपड़ का खेल
Kailash Par Chaupar Ka Khel
कैलाश पर सदा तप, ध्यान और समाधि का ही वातावरण रहता था। परन्तु शिव-परिवार का एक कोमल, गृहस्थ पक्ष भी था, जहाँ हँसी थी, ठिठोली थी और कभी-कभी रूठना-मनाना भी। एक दिन माता पार्वती ने देखा कि शिव जी दीर्घकाल से समाधि में लीन हैं। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "स्वामी, आप तो सदा ध्यान में ही डूबे रहते हैं। आज कुछ समय मेरे साथ भी बिताइए। आइए, चौपड़ खेलते हैं।" शिव जी ने आँखें खोलीं और हँसकर स्वीकार कर लिया।
चौपड़ भारत का अत्यंत प्राचीन खेल है। कपड़े का एक क्रॉस आकार का पट, उस पर चलने वाली गोटियाँ और लंबे पासे या कौड़ियाँ, इन्हीं से यह खेल खेला जाता है। इसमें कौशल भी चाहिए और भाग्य भी। यही कारण है कि पुराणों में इसे प्रायः नियति का प्रतीक माना गया है, जैसे जीवन में भी हमारे प्रयास और भाग्य दोनों साथ चलते हैं। पार्वती जी ने पट बिछाया, गोटियाँ रखीं और खेल आरंभ हुआ।
पहले तो खेल हँसी-मज़ाक में चला। परन्तु फिर पार्वती जी ने कहा, "बिना दाँव के खेल में रस कहाँ? कुछ लगाइए।" शिव जी ने पहला दाँव लगाया, अपना त्रिशूल और हार गए। फिर उन्होंने लगाया, गले का सर्प। वह भी गया। फिर डमरू, फिर रुद्राक्ष माला, फिर जटाओं का चंद्रमा, फिर व्याघ्रचर्म। एक-एक करके सब कुछ पार्वती जी के पास चला गया। शिव जी को जैसे कोई चाल ही नहीं जमी। अंततः वह क्षण भी आया जब उनके पास लगाने को कुछ शेष न रहा। हँसते हुए उन्होंने कहा, "अब तो मेरे पास केवल मैं हूँ। वही लगाता हूँ।" और वह दाँव भी हार गए।
पार्वती जी ने विजयी मुस्कान के साथ कहा, "अब आप मेरे हुए, और आपका सब कुछ भी मेरा।" शिव जी ने भौंहें चढ़ाईं, "नहीं देवी, वह चाल विवादास्पद थी। वह दाँव मैंने जीता था, तुमने नहीं।" दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़ गए। हँसी-ठिठोली का यह प्रसंग अब वाद-विवाद में बदलने लगा। पार्वती जी बोलीं, "तो किसी को साक्षी बनाइए। जो निष्पक्ष होकर सत्य बताए।"
वहीं द्वार पर शिव जी के परम भक्त और वाहन नंदी खड़े थे। उन्हें बुलाया गया। पार्वती जी ने कहा, "नंदी, तुमने पूरा खेल देखा है। सत्य बताओ, जीत किसकी हुई?" अब नंदी असमंजस में पड़ गए। सत्य तो यह था कि पार्वती जी जीती थीं, परन्तु नंदी शिव जी के अनन्य सेवक थे। उनका मन बोला, "यदि मैंने सत्य कह दिया तो मेरे स्वामी की हार होगी, उनका अपमान होगा। मैं अपने स्वामी की पराजय कैसे स्वीकार करूँ?" भक्ति के मोह में उन्होंने कह दिया, "जीत महादेव की हुई है।"
यह सुनते ही माता पार्वती का मुख गंभीर हो गया। उन्हें हार का दुःख नहीं था, दुःख इस बात का था कि जिसे निष्पक्ष साक्षी बनाया गया, उसने पक्षपात किया। उन्होंने कहा, "नंदी! साक्षी का धर्म केवल एक होता है, सत्य। साक्षी न पक्ष देखता है, न सम्बन्ध, न स्वामी। तुमने भक्ति के नाम पर असत्य बोला। स्मरण रखो, जो असत्य किसी के प्रेम में बोला जाए, वह भी असत्य ही रहता है।" और उन्होंने नंदी को श्राप दे दिया कि उन्हें एक कष्टकर रोग भोगना पड़ेगा और वे अपनी शक्ति खो देंगे।
नंदी काँपते हुए माता के चरणों में गिर पड़े, "माता, मैंने द्वेष से नहीं, मोह से यह कहा। मुझसे भूल हुई। मुझे क्षमा कीजिए।" पार्वती जी करुणामयी थीं। उन्होंने कहा, "श्राप लौटाया नहीं जा सकता, पर उसका मार्ग दिया जा सकता है। मेरे भक्त वर्ष में जिस दिन मेरी विशेष पूजा करेंगे, उस पूजा से जो पुण्य उत्पन्न होगा, उसका स्पर्श तुम्हें भी मिलेगा और तुम मुक्त हो जाओगे।"
इस प्रसंग के बाद वातावरण भारी हो गया। शिव जी को यह अच्छा नहीं लगा कि उनके सेवक को दंड मिला और पार्वती जी को यह अच्छा नहीं लगा कि सत्य को तोड़ा गया। अभिमान दोनों ओर था। शिव जी उठे और कैलाश छोड़कर वन में चले गए, जहाँ वे पुनः तप में लीन हो गए। पार्वती जी ने कुछ समय प्रतीक्षा की। फिर उन्होंने वही किया जो वे सदा करती आई हैं, अभिमान नहीं, प्रेम चुना। उन्होंने एक किरात कन्या का रूप धारण किया और उसी वन में जा पहुँचीं जहाँ शिव जी तप कर रहे थे। उनका सौंदर्य, उनकी सरलता और उनकी सेवा देखकर शिव जी का मन आकृष्ट हुआ। जब उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा, तो किरात कन्या ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर दिया, सामने स्वयं पार्वती थीं। शिव जी हँस पड़े। मान भंग हो गया, रूठना समाप्त हो गया और दोनों पुनः कैलाश लौट आए।
एक अन्य लोकप्रिय पाठ में कथा इस प्रकार आगे बढ़ती है कि शिव जी सब कुछ हारकर व्यथित थे। तब भगवान विष्णु ने उनकी सहायता की। उन्होंने कहा, "पुनः खेलिए, मैं साथ हूँ।" खेल फिर आरंभ हुआ और इस बार शिव जी जीतते चले गए। उन्होंने अपना त्रिशूल, सर्प, चंद्रमा, सब वापस पा लिया। पार्वती जी को संदेह हुआ। उन्होंने पूछा, "अचानक यह पलटाव कैसे?" तब ज्ञात हुआ कि विष्णु जी स्वयं पासों में प्रविष्ट हो गए थे। पार्वती जी ने हँसते हुए कहा, "तो यह छल था!" और विष्णु जी को उलाहना दिया। विष्णु जी ने विनम्रता से क्षमा माँगी और कहा कि उन्होंने मित्रता के धर्म का पालन किया। अंततः यह प्रसंग हँसी में समाप्त हुआ, क्योंकि देवताओं के बीच का यह खेल जीत-हार का नहीं, लीला का था।
इस कथा से एक लोक-परंपरा भी जुड़ी है। मान्यता है कि खेल के अंत में प्रसन्न होकर माता पार्वती ने वरदान दिया, "जो व्यक्ति दीपावली की रात्रि में शुभ भाव से चौपड़ या पासा खेलेगा, उसके घर में वर्ष भर लक्ष्मी का वास रहेगा।" इसी कारण उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में दीपावली की रात पारिवारिक रूप से पासा या ताश खेलने की परंपरा चली आ रही है। परन्तु यहाँ एक बात अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह परंपरा एक रात्रि की शुभ क्रीड़ा के रूप में है, व्यसन के रूप में नहीं। शास्त्रों ने द्यूत को सदा दोष माना है। इसलिए इस परंपरा का भाव उत्सव और सामूहिकता का है, लोभ का नहीं।