
हनुमान का रुद्रावतार — शिव का ग्यारहवाँ रुद्र रूप
Hanuman Ka Rudravatar — Shiv Ka Gyarahvan Rudra Roop
हनुमान जी की महिमा को समझने के लिए उनके जन्म के पीछे छिपे गूढ़ दिव्य रहस्य को जानना आवश्यक है। शास्त्रों में हनुमान जी को केवल एक वीर भक्त ही नहीं, अपितु स्वयं भगवान शंकर का अवतार माना गया है। वे शिव के ग्यारह रुद्र-रूपों में से एक — "ग्यारहवें रुद्र" के रूप में अवतरित हुए, इसीलिए उन्हें "रुद्रावतार" कहा जाता है।
इस अवतार के पीछे एक अद्भुत कथा है। जब सृष्टि में धर्म की स्थापना और भक्तों के कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब भगवान शंकर ने विचार किया कि श्रीराम की लीलाओं में सहभागी बनने और उनकी सेवा का सौभाग्य पाने के लिए वे स्वयं भी अवतार लेंगे। एक भक्त बनकर, सेवक बनकर, अपने आराध्य श्रीराम के चरणों में समर्पित होकर वे भक्ति का परम आदर्श संसार के समक्ष प्रस्तुत करना चाहते थे।
भगवान शंकर ने अपने रुद्र-तेज से माता अंजनी के गर्भ में अवतार लिया। इसीलिए हनुमान जी में शिव के समान अपार बल, तेज, वैराग्य और योग-सामर्थ्य विद्यमान था। वे रुद्र के अंश थे, किंतु उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को श्रीराम की भक्ति और सेवा में समर्पित कर दिया। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है — इतनी अपार शक्ति होते हुए भी उन्होंने सदैव विनम्रता, दास्य-भाव और सेवा को ही अपना धर्म माना।
रुद्रावतार होने के कारण ही हनुमान जी में वे समस्त दिव्य गुण थे जो एक पूर्ण योगी और महान वीर में होते हैं। वे अष्ट-सिद्धि और नव-निधि के स्वामी थे, इच्छानुसार अपना रूप छोटा या विशाल कर सकते थे, वायु के समान वेगवान थे, और मृत्यु उन्हें छू भी नहीं सकती थी — वे चिरंजीवी थे। फिर भी उन्होंने इन समस्त शक्तियों का प्रयोग कभी अपने अहंकार के लिए नहीं, अपितु सदा धर्म, भक्ति और श्रीराम की सेवा के लिए ही किया।
यही कारण है कि हनुमान जी शिव और राम — दोनों की दिव्यता के संगम हैं। वे स्वयं महादेव के अंश हैं, और साथ ही श्रीराम के परम भक्त भी। इसीलिए शिव-भक्त और राम-भक्त दोनों ही उन्हें समान श्रद्धा से पूजते हैं। जो हनुमान जी की आराधना करता है, उसे शिव और राम — दोनों की कृपा एक साथ प्राप्त होती है। यही उनकी अनुपम महिमा है।
कहा जाता है कि कलियुग में हनुमान जी सदा जागृत और उपस्थित रहते हैं। जहाँ-जहाँ श्रीराम की कथा और भजन होते हैं, वहाँ-वहाँ वे किसी न किसी रूप में विराजमान रहकर अपने आराध्य का गुणगान सुनते हैं। वे भक्तों के संकटों को हरने वाले "संकटमोचन" हैं और सच्चे हृदय से पुकारने पर तुरंत सहायता के लिए प्रकट होते हैं।
रुद्रावतार की यह कथा हमें यह परम भाव देती है कि सच्ची महानता शक्ति में नहीं, अपितु उस शक्ति को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देने में है — और हनुमान जी इसी समर्पण, भक्ति और सेवा के अमर आदर्श हैं।