
गोवर्धन धारण — इंद्र का मान-मर्दन और गोवर्धन पूजा की शुरुआत
Govardhan Dharan — Indra Ka Maan-Mardan aur Govardhan Puja
वृंदावन में एक प्रथा थी कि वर्षा के देवता इन्द्र को प्रसन्न रखने के लिए ब्रजवासी प्रतिवर्ष एक विशाल यज्ञ करते थे। एक बार श्रीकृष्ण ने अपने पिता नन्द बाबा तथा अन्य गोपजनों से पूछा कि यह किसकी पूजा की तैयारी हो रही है। नन्द बाबा ने बताया कि यह इन्द्र-यज्ञ है, क्योंकि इन्द्र वर्षा करते हैं जिससे अन्न उपजता है और गौओं को चारा मिलता है।
श्रीकृष्ण ने विनयपूर्वक अपना मत रखा — 'हे पिताजी! हम तो गोप हैं, हमारा जीवन गौओं और इस गोवर्धन पर्वत के आश्रित है। यही पर्वत हमें घास, जल, कन्दमूल-फल और आश्रय देता है, यहीं हमारी गौएँ चरती हैं। अतः हमें इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत, ब्राह्मणों और गौओं की पूजा करनी चाहिए, जो प्रत्यक्ष रूप से हमारा पालन करते हैं।' कृष्ण के वचनों में ऐसा सत्य और प्रेम था कि नन्द बाबा तथा सभी गोपों ने सहमति दे दी।
अगले दिन ब्रजवासियों ने इन्द्र-यज्ञ की सारी सामग्री गोवर्धन पूजा में लगा दी। तरह-तरह के भोग, अन्नकूट, दूध-दही, पकवान बनाकर उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अर्पित किए, ब्राह्मणों को भोजन कराया और गौओं की पूजा की। सबने प्रेमपूर्वक गोवर्धन की परिक्रमा की। तब श्रीकृष्ण ने पर्वत रूप धारण कर सारा भोग स्वीकार किया और आशीर्वाद दिया। ब्रजवासी आनन्दित हुए।
अपनी पूजा बन्द होते देख इन्द्र क्रोध से भर उठे। उन्होंने अपने अहंकार में ब्रज को दण्ड देने का निश्चय किया और सांवर्तक नामक प्रलयकारी मेघों को आज्ञा दी कि वे ब्रज पर मूसलाधार वर्षा करके उसे डुबो दें। मेघ गरजने लगे, बिजली कड़कने लगी और ऐसी भयानक वृष्टि होने लगी, मानो प्रलय आ गया हो। शीतल आँधी और जलधारा से ब्रजवासी तथा गौएँ काँपने लगीं और अपने रक्षक श्रीकृष्ण की शरण में दौड़ीं।
तब करुणासागर श्रीकृष्ण ने सबको आश्वस्त किया और खेल-खेल में अपने बाएँ हाथ की कनिष्ठा अँगुली पर विशाल गोवर्धन पर्वत को छत्र की भाँति उठा लिया। उन्होंने सभी ब्रजवासियों, गौओं और गोपों को उस पर्वत के नीचे बुला लिया। पूरे सात दिन-रात तक श्रीकृष्ण अविचल भाव से पर्वत को थामे खड़े रहे, और मूसलाधार वर्षा के बीच भी पर्वत के नीचे सब सुरक्षित एवं शान्त रहे — न कोई भूख से व्याकुल हुआ, न कोई भय से।
सात दिन में जब इन्द्र का सारा बल थक गया और मेघ शान्त हो गए, तब उन्हें अपनी भूल का बोध हुआ। यह जानकर कि यह बालक साक्षात भगवान हैं, इन्द्र लज्जित होकर श्रीकृष्ण के चरणों में आए और क्षमा माँगी। उन्होंने कामधेनु सहित भगवान का अभिषेक किया और स्तुति की। श्रीकृष्ण ने पर्वत यथावत रख दिया और सबको सकुशल घर भेज दिया। तभी से ब्रज में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की परम्परा आरम्भ हुई।
इस लीला की महिमा यही है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए पर्वत तक उठा लेते हैं और देवताओं के अभिमान का भी मर्दन कर देते हैं — जो प्रभु की शरण में है, उसे प्रकृति का प्रलय भी छू नहीं सकता।