
आम के फल की परिक्रमा — गणेश और कार्तिकेय की प्रतिस्पर्धा
Ganesha and Kartikeya's Race for the Divine Mango
कैलाश पर शिव-परिवार पूर्ण था। भगवान शिव, माता पार्वती और उनके दो पुत्र वहाँ निवास करते थे। कार्तिकेय तेजस्वी, वीर और चंचल थे। वे देवसेना के सेनापति थे, जिनका वाहन मयूर और अस्त्र वेल था। वे शीघ्रता और पराक्रम के प्रतीक थे। दूसरी ओर गणेश स्थिर, शांत और गहन विचारक थे। उनका वाहन मूषक था और बुद्धि उनका बल। वे धैर्य और विवेक के प्रतीक थे। दोनों भाइयों में स्नेह के साथ-साथ स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा भी थी।
एक दिन देवर्षि नारद कैलाश पधारे। उनके हाथ में एक अत्यंत सुंदर और स्वर्णिम आभा वाला आम था। शिव जी के पूछने पर नारद जी ने बताया कि यह साधारण आम नहीं, बल्कि ज्ञान का फल है। इसमें समस्त वेदों का सार, अमरत्व और परम ज्ञान समाहित है। इसे काटा या बाँटा नहीं जा सकता, इसलिए यह केवल एक ही व्यक्ति को मिल सकता था।
गणेश जी और कार्तिकेय, दोनों ने ही फल पर अपना अधिकार जताया। कार्तिकेय ने अपनी ज्येष्ठता और वीरता का तर्क दिया, तो गणेश जी ने स्वयं को बुद्धि का अधिपति और प्रथम पूज्य बताया। शिव-पार्वती संकट में पड़ गए क्योंकि दोनों पुत्र उन्हें समान प्रिय थे। तब शिव जी ने एक प्रतियोगिता की घोषणा की। उन्होंने कहा कि जो भी सम्पूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करके सबसे पहले यहाँ लौट आएगा, यह फल उसी का होगा।
कार्तिकेय ने बिना समय गँवाए अपने मयूर पर सवार होकर आकाश में उड़ान भरी। वे मन ही मन अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे। उन्होंने पर्वत, समुद्र और सप्तद्वीपों की परिक्रमा आरंभ की। उधर गणेश जी ने अपने छोटे वाहन मूषक को देखा और विचार किया कि गति में वे कार्तिकेय से नहीं जीत सकते। उन्होंने सोचा कि यदि यह ज्ञान का फल है, तो इसे पाने का मार्ग भी ज्ञान ही होना चाहिए।
गणेश जी ने शांत भाव से अपने माता-पिता, शिव और पार्वती को आसन पर विराजने की प्रार्थना की। उन्होंने हाथ जोड़कर उनकी तीन परिक्रमा कीं और चरण स्पर्श करते हुए कहा कि उन्होंने ब्रह्मांड की परिक्रमा पूर्ण कर ली है। उन्होंने तर्क दिया कि माता-पिता ही समस्त चराचर के स्वामी हैं और सम्पूर्ण सृष्टि उन्हीं में समाहित है। शिव जी गणेश जी के इस विवेक से प्रसन्न हुए और फल उन्हें दे दिया गया।
बहुत समय बाद कार्तिकेय लौटे। जब उन्हें पता चला कि गणेश जी ने केवल माता-पिता की परिक्रमा करके फल प्राप्त कर लिया है, तो वे रुष्ट हो गए। उन्होंने इसे छल माना और कैलाश छोड़कर दक्षिण दिशा के क्रौंच पर्वत पर चले गए। वहाँ उन्होंने तपस्वी का रूप धारण कर लिया। शिव-पार्वती उन्हें मनाने वहाँ पहुँचे। माता पार्वती ने उन्हें समझाया कि 'फल तुम ही हो' (तमिल में 'पषम् नी')। इसी वाक्य से उस स्थान का नाम पलनी पड़ा।
आज पलनी मुरुगन मंदिर दक्षिण भारत का प्रसिद्ध तीर्थ है। इस कथा का सार यह है कि बुद्धि और विवेक का मार्ग सदैव गति से श्रेष्ठ होता है। साथ ही, यह कथा भारतीय संस्कृति में माता-पिता के सर्वोच्च स्थान को भी स्थापित करती है कि वास्तविक तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं।