
गांधारी का श्राप
Gandhari ka Shraap
महाभारत का भयंकर युद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की भूमि पर कौरवों का सारा वंश समाप्त हो गया था। गांधारी, जो धृतराष्ट्र की पतिव्रता पत्नी और अपने सौ पुत्रों की माता थीं, अपने समस्त पुत्रों के वियोग में शोक के अपार सागर में डूब गईं। पुत्र-शोक से संतप्त उस माता का हृदय टुकड़े-टुकड़े हो चुका था।
जब पांडव और भगवान श्रीकृष्ण गांधारी को सांत्वना देने के लिए उनके पास पहुँचे, तब पुत्र-वियोग में व्याकुल गांधारी का ममता-भरा हृदय क्षोभ से भर उठा। उन्होंने मन ही मन यह अनुभव किया कि यदि भगवान श्रीकृष्ण चाहते, तो अपनी अपार शक्ति से इस विनाशकारी युद्ध को रोक सकते थे और उनके पुत्रों की रक्षा कर सकते थे। इसी वेदना में उनका मन भगवान के प्रति उलाहने से भर गया।
क्रोध और शोक से अभिभूत गांधारी ने भगवान श्रीकृष्ण को संबोधित करते हुए कहा — "हे माधव! तुम चाहते तो इस कुल-संहार को टाल सकते थे, किंतु तुमने ऐसा नहीं किया। अतः जिस प्रकार आज मेरा कुरुवंश आपस में लड़कर नष्ट हो गया, उसी प्रकार आज से छत्तीस वर्ष पश्चात तुम्हारा यादव वंश भी आपस में ही लड़कर नष्ट हो जाएगा, और तुम्हारी भी मृत्यु एक साधारण निमित्त से होगी।"
भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्राप को अत्यंत विनम्रता और प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा — "हे माता, मैं आपके इस श्राप को स्वीकार करता हूँ। मैं तो पहले से ही यही जानता था कि यादव वंश अपने अहंकार और मद के कारण नष्ट होगा। आपके श्राप ने केवल उसी अवश्यंभावी घटना को वाणी दी है। इसमें आपका कोई दोष नहीं।" भगवान ने माता के पुत्र-शोक को समझते हुए उन्हें दोष नहीं दिया, अपितु सांत्वना दी।
समय आने पर यह श्राप सत्य सिद्ध हुआ। छत्तीस वर्ष पश्चात यादवगण प्रभास क्षेत्र में मदिरा के मद और आपसी वैर के कारण परस्पर लड़कर नष्ट हो गए। इस प्रकार यादव वंश का अंत हुआ। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने भी एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते समय, जरा नामक व्याध के बाण को निमित्त बनाकर अपनी लीला का संवरण किया और अपने परमधाम को प्रस्थान कर गए।
इस लीला का भाव यही है कि भगवान अपने भक्तों की भावनाओं और यहाँ तक कि उनके शोक-भरे उलाहने का भी सम्मान करते हैं। उन्होंने माता गांधारी के श्राप को सहर्ष शिरोधार्य करके यह सिखाया कि कर्म और नियति के विधान से कोई भी परे नहीं है — यहाँ तक कि स्वयं भगवान भी अपनी लीला में उसे धारण करते हैं। यह कथा अहंकार-त्याग, कर्म-फल की अनिवार्यता और भगवान की करुणा का अमर संदेश देती है।