
दुर्वासा और अक्षय पात्र की कथा — एक दाना
Durvasa aur Akshay Paatra ki Katha — Ek Daana
पांडव जब वनवास काट रहे थे, तब सूर्यदेव ने युधिष्ठिर को एक दिव्य अक्षय पात्र प्रदान किया था। इस पात्र की विशेषता यह थी कि इसमें से तब तक अन्न मिलता रहता था, जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न कर लें। द्रौपदी सबको खिलाकर अंत में स्वयं भोजन करतीं, और जिस दिन वे भोजन कर लेतीं, उस दिन पात्र फिर अगले दिन तक कुछ नहीं देता था।
दुर्योधन इस बात से सदा जलता था कि वनवास में भी पांडव सुखी हैं। उसने पांडवों को संकट में डालने की एक कुटिल योजना बनाई। वह जानता था कि महर्षि दुर्वासा अत्यंत क्रोधी स्वभाव के हैं और तनिक-सी सेवा में त्रुटि होने पर श्राप दे देते हैं। दुर्योधन ने बड़ी विनम्रता से दुर्वासा और उनके हज़ारों शिष्यों की सेवा की और उन्हें प्रसन्न कर दिया।
दुर्योधन ने चतुराई से दुर्वासा से प्रार्थना की कि वे अपने शिष्यों सहित पांडवों के पास भी भोजन के लिए पधारें, किंतु ठीक उस समय, जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हों। दुर्योधन जानता था कि उस समय पात्र खाली होगा और पांडव इतने अतिथियों को भोजन न करा पाएँगे, जिससे कुपित दुर्वासा उन्हें श्राप दे देंगे। यही उसका दुष्ट अभिप्राय था।
दुर्वासा अपने शिष्यों सहित पांडवों के आश्रम पहुँचे और स्नान करने नदी पर चले गए। इधर द्रौपदी अपना भोजन कर चुकी थीं और अक्षय पात्र भी खाली हो चुका था। इतने सारे अतिथियों को कैसे भोजन कराया जाए — यह चिंता द्रौपदी को व्याकुल कर गई। सारे उपाय विफल जानकर उन्होंने अपने अंतिम आश्रय, प्राणों के प्यारे श्रीकृष्ण को आर्त भाव से पुकारा।
द्रौपदी की पुकार सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण तत्काल वहाँ प्रकट हो गए। उन्होंने कहा — "बहन, मुझे बहुत भूख लगी है, पहले मुझे कुछ खिलाओ।" द्रौपदी लज्जित होकर बोलीं कि पात्र तो खाली है। भगवान ने पात्र मँगवाया और उसमें चिपका हुआ साग का केवल एक दाना निकालकर यह कहते हुए ग्रहण कर लिया कि "यह एक कण समस्त जगत को तृप्त कर दे।"
भगवान के उस एक दाने ग्रहण करते ही एक अद्भुत चमत्कार हुआ। नदी में स्नान कर रहे दुर्वासा और उनके सभी शिष्यों के पेट अचानक इस प्रकार भर गए, मानो उन्होंने छप्पन भोग खा लिए हों। उन्हें ऐसी तृप्ति और डकार आने लगी कि अब भोजन का नाम सुनते ही उन्हें ग्लानि होने लगी। लज्जित दुर्वासा बिना भोजन किए ही अपने शिष्यों सहित वहाँ से लौट गए और पांडव श्राप से बच गए।
इस लीला का भाव यही है कि भगवान भाव और भक्ति से तृप्त होते हैं, अन्न की मात्रा से नहीं। जब भक्त सच्चे हृदय से पुकारता है, तो प्रभु एक कण से ही समस्त संसार की भूख शांत कर देते हैं। जिसका रक्षक स्वयं गोविंद हो, उसका कोई श्राप या संकट अनिष्ट नहीं कर सकता।