
भस्मासुर वध — मोहिनी रूप की कथा
Bhasmasura Vadha — Mohini Roop Ki Katha
१. एक असुर की महत्वाकांक्षा
प्राचीन काल में भस्मासुर नामक एक असुर था। कुछ पाठों में उसे वृकासुर भी कहा गया है। वह अत्यंत बलशाली था, परन्तु उसकी महत्वाकांक्षा उसके बल से भी बड़ी थी। वह चाहता था कि तीनों लोकों में उससे बड़ा कोई न हो — न देवता, न असुर, न मनुष्य।
उसने विचार किया — "बल से यह संभव नहीं। वरदान से ही यह हो सकता है। और वरदान देने में सबसे शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं भगवान शिव — जिन्हें आशुतोष कहा जाता है, अर्थात् जो शीघ्र प्रसन्न हो जाएँ।"
२. घोर तपस्या
भस्मासुर वन में गया और उसने अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ की। वर्षों तक वह निराहार रहा, एक पैर पर खड़ा रहा, ग्रीष्म में अग्नि के बीच और शीत में हिम में तप करता रहा। उसका शरीर सूखकर अस्थिपंजर मात्र रह गया, परन्तु संकल्प नहीं डिगा।
अंततः भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले — "तुम्हारा तप सफल हुआ। वर माँगो।"
३. वह भयंकर वर
भस्मासुर ने हाथ जोड़कर कहा — "प्रभु, मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं जिसके भी सिर पर अपना हाथ रख दूँ, वह उसी क्षण भस्म हो जाए।"
शिव जी एक क्षण के लिए ठिठके। यह वर साधारण नहीं था — यह स्वयं में एक अस्त्र था, और वह भी ऐसा जिससे बचाव असंभव। परन्तु शिव जी की एक विशेषता — और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है — वे भक्त के भाव को देखते हैं, उसकी जाति या कुल को नहीं। और एक बार वचन दे दिया तो पीछे नहीं हटते। उन्होंने "तथास्तु" कह दिया।
४. वरदान का पहला प्रयोग
भस्मासुर की आँखों में तुरंत चमक आ गई। उसने सोचा — "यह वरदान वास्तव में काम करता है या नहीं, यह परखना चाहिए। और परीक्षा भी सर्वोच्च पर ही करनी चाहिए।"
और उसने वह किया जो कृतघ्नता की पराकाष्ठा थी — उसने अपना हाथ उठाया और स्वयं शिव जी के सिर पर रखने के लिए आगे बढ़ा। उसने कहा — "महादेव! सबसे पहले मैं आपको ही भस्म करूँगा। और फिर माता पार्वती को अपनी पत्नी बनाऊँगा।"
५. शिव का भागना
शिव जी स्तब्ध रह गए। वे चाहते तो उसे उसी क्षण नष्ट कर सकते थे — परन्तु वे स्वयं अपना दिया वरदान कैसे झुठलाते? जो वचन उन्होंने दिया, उसे तोड़ना उनके स्वभाव के विरुद्ध था। अतः उन्होंने वही किया जो उस स्थिति में एकमात्र मार्ग था — वे वहाँ से भागे।
भस्मासुर हाथ फैलाए पीछे दौड़ा। शिव जी पर्वतों पर दौड़े, वनों में दौड़े, नदियाँ पार कीं, गुफाओं में छिपे — परन्तु भस्मासुर पीछा नहीं छोड़ रहा था। यह दृश्य समस्त सृष्टि के लिए विचित्र और भयावह था — जो सृष्टि के संहारक हैं, वे आज अपने ही भक्त से प्राण बचाकर भाग रहे थे।
६. विष्णु जी की शरण
अंततः शिव जी भगवान विष्णु के पास पहुँचे और सारा वृत्तांत सुनाया। विष्णु जी ने कहा — "प्रभु, आपने वरदान दिया है, अतः आप उसे मार नहीं सकते। परन्तु जो वर छल और लोभ से माँगा गया हो, उसका अंत भी उसी की बुद्धि से हो सकता है। जो अपने ही वरदान के अहंकार में डूबा है, उसे उसी वरदान से समाप्त किया जाएगा। आप विश्राम कीजिए। मैं देखता हूँ।"
७. मोहिनी का प्रकट होना
भगवान विष्णु ने अपना सर्वाधिक प्रसिद्ध रूप धारण किया — मोहिनी। वह रूप ऐसा था जिसे देखकर तीनों लोकों की चेतना ठहर जाए। अद्वितीय सौंदर्य, मंद मुस्कान, और गति में एक ऐसी लय जैसे स्वयं नृत्य चल रहा हो। (यही वह रूप है जो समुद्र मंथन के समय भी विष्णु जी ने धारण किया था, जब असुरों से अमृत लेकर देवताओं को पिलाया गया था।)
मोहिनी उस वन में पहुँचीं जहाँ भस्मासुर शिव जी को खोज रहा था — और वहीं वे नृत्य करने लगीं।
८. भस्मासुर मोहित हो गया
भस्मासुर की दृष्टि उन पर पड़ी। उसी क्षण वह शिव जी को भूल गया, वरदान भूल गया, अपना उद्देश्य भूल गया। वह मंत्रमुग्ध होकर बोला — "हे सुंदरी! तुम कौन हो? मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।"
मोहिनी ने नृत्य रोका नहीं। उन्होंने मुस्कुराकर कहा — "मैं एक शर्त पर विवाह करूँगी। मैं नृत्य में निपुण हूँ, और मेरे पिता ने प्रतिज्ञा कराई है कि मैं उसी से विवाह करूँगी जो नृत्य में मेरी हर मुद्रा का ठीक-ठीक अनुकरण कर सके।"
भस्मासुर तुरंत बोला — "बस इतनी सी बात? मैं तैयार हूँ।"
९. नृत्य आरंभ
मोहिनी ने नृत्य आरंभ किया और भस्मासुर उनके सामने खड़ा होकर हर मुद्रा दोहराने लगा। मोहिनी हाथ ऊपर उठातीं — भस्मासुर भी उठाता। मोहिनी घूमतीं — वह भी घूमता। मोहिनी झुकतीं — वह भी झुकता।
नृत्य की गति बढ़ती गई। भस्मासुर उसमें पूरी तरह डूब गया — उसका ध्यान केवल अनुकरण पर था, उसकी बुद्धि पूर्णतः मोहित थी।
१०. वह अंतिम मुद्रा
और फिर मोहिनी ने अत्यंत सहजता से — मानो वह नृत्य की एक स्वाभाविक मुद्रा हो — अपना दाहिना हाथ उठाकर अपने ही सिर पर रख लिया। भस्मासुर ने बिना एक क्षण सोचे वही किया। उसने अपना हाथ अपने ही सिर पर रख दिया।
११. भस्म
उसी क्षण वरदान ने अपना कार्य किया। एक ज्वाला उठी, और महाबली भस्मासुर वहीं जलकर भस्म हो गया। एक मुट्ठी राख के अतिरिक्त कुछ शेष न रहा। जिस वरदान से वह तीनों लोकों को जीतना चाहता था, उसी वरदान ने उसे समाप्त कर दिया — और वह भी किसी अस्त्र से नहीं, उसके अपने ही हाथ से।
१२. शिव-विष्णु का संवाद
भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने विष्णु जी को धन्यवाद दिया। मान्यता है कि शिव जी ने कहा — "आज आपने केवल मेरी रक्षा नहीं की, आपने वचन की मर्यादा भी बचाई। मैंने जो कहा था, वह भी सत्य रहा — मैंने उसे मारा नहीं। और सृष्टि भी बच गई।"
(कुछ परंपराओं के अनुसार इसी प्रसंग के पश्चात् शिव और विष्णु के एकत्व का भाव और दृढ़ हुआ, जिससे हरिहर स्वरूप की उपासना जुड़ी है — जहाँ आधा शरीर विष्णु का और आधा शिव का होता है।)
१३. स्थान-मान्यता
कर्नाटक के मैसूर के निकट कुछ स्थानों पर यह मान्यता है कि यहीं भस्मासुर भस्म हुआ था। विशेषकर भस्मासुर मले (भस्मासुर पहाड़ी) और मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी ऐसी स्थानीय मान्यताएँ प्रचलित हैं, जहाँ की राख जैसी सफेद मिट्टी को इसी कथा से जोड़ा जाता है। (ये लोक-मान्यताएँ हैं, इनका कोई एक शास्त्रीय निर्धारण नहीं है।)
१४. कथा का सार
पहला संदेश — कृतघ्नता सबसे बड़ा पाप है। भस्मासुर ने जिससे वरदान लिया, सबसे पहले उसी पर प्रयोग करना चाहा। जो अपने उपकारी के प्रति ही विश्वासघात करे, उसका पतन निश्चित है।
दूसरा संदेश — शक्ति बिना विवेक के आत्मघाती है। भस्मासुर के पास असीम शक्ति थी, परन्तु विवेक शून्य था। उसने अपना ही हाथ अपने सिर पर रख लिया। विवेकहीन शक्ति सबसे पहले अपने स्वामी को ही नष्ट करती है।
तीसरा संदेश — मोह बुद्धि का सबसे बड़ा शत्रु है। एक क्षण पहले वह विजय के शिखर पर था। मोहिनी को देखते ही सब भूल गया। जब मन मोहित हो जाता है, तब सबसे स्पष्ट खतरा भी दिखाई नहीं देता।
चौथा संदेश — वचन की मर्यादा। शिव जी भागे, पर वचन नहीं तोड़ा। मर्यादा वही है जो कठिन क्षण में भी न टूटे। आज के संदर्भ में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है — दिया हुआ वचन तब भी निभाना जब वह हमारे विरुद्ध जा रहा हो, यही चरित्र है।
पाँचवाँ संदेश — बल का उत्तर बुद्धि है।