Ashwatthama ka Brahmastra aur Parikshit ki Raksha

अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र और परीक्षित की रक्षा

Ashwatthama ka Brahmastra aur Parikshit ki Raksha

महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था और धर्म की विजय हुई थी। किंतु गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा अपने पिता की छलपूर्वक हुई मृत्यु और कौरवों के विनाश से क्रोध और प्रतिशोध की आग में जल रहे थे। उसने रात्रि के अंधकार में सोते हुए द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की निर्मम हत्या कर दी, जो सर्वथा अधर्मपूर्ण और नीच कृत्य था।

इस भयंकर अपराध का समाचार सुनकर पांडव और द्रौपदी शोक से व्याकुल हो उठे। अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा किया। जब अश्वत्थामा ने अपने आप को घिरा हुआ देखा, तो उसने अपने प्राणों की रक्षा और प्रतिशोध के लिए अत्यंत घातक "ब्रह्मास्त्र" का प्रयोग कर दिया, किंतु उसे वापस लौटाने की विधि वह नहीं जानता था।

अर्जुन ने भी भगवान के आदेश पर उस ब्रह्मास्त्र को रोकने के लिए अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। दोनों दिव्यास्त्रों के टकराने से सारी सृष्टि के विनाश की भयंकर संभावना उत्पन्न हो गई। तब भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर महर्षि व्यास ने बीच में आकर दोनों वीरों को अपने-अपने अस्त्र वापस लेने को कहा। अर्जुन ने अपना अस्त्र लौटा लिया, किंतु अश्वत्थामा वैसा न कर सका।

तब क्रोध और द्वेष से भरे अश्वत्थामा ने अपने ब्रह्मास्त्र की दिशा मोड़कर उसे उत्तरा (अभिमन्यु की पत्नी) के गर्भ की ओर मोड़ दिया, ताकि पांडव वंश का अंतिम अंकुर, जो गर्भ में पल रहा था, भी नष्ट हो जाए और पांडवों का वंश ही समाप्त हो जाए। यह अधर्म की पराकाष्ठा थी — एक अजन्मे शिशु पर प्रहार।

किंतु भक्तवत्सल और वंश-रक्षक भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों के वंश की रक्षा का संकल्प लिया। उन्होंने अपने सूक्ष्म रूप से उत्तरा के गर्भ में प्रवेश किया और अपने दिव्य सुदर्शन चक्र से उस अजन्मे शिशु को ब्रह्मास्त्र के प्रलयंकारी प्रभाव से ढककर सुरक्षित रख लिया। इस प्रकार भगवान ने गर्भ में ही उस शिशु के प्राणों की रक्षा की।

चूँकि इस शिशु ने गर्भ में ही मृत्यु के समान संकट को झेला और भगवान की परीक्षा-रूपी रक्षा पाई, अतः उसका नाम "परीक्षित" रखा गया। यही परीक्षित आगे चलकर धर्मात्मा राजा बने, और उन्हीं को शुकदेव जी ने श्रीमद्भागवत की अमर कथा सुनाई थी। भगवान ने अपने वचन के अनुसार पांडव वंश की रक्षा कर ली।

इस लीला का भाव यही है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा गर्भ से लेकर जीवन-पर्यंत करते हैं। जो सर्वस्व भगवान को समर्पित कर देता है, उसके वंश और मान की रक्षा स्वयं प्रभु करते हैं। अधर्म कितना भी घातक अस्त्र चलाए, भगवान की कृपा का सुदर्शन चक्र भक्त की सदैव रक्षा करता है।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Draupadi Cheerharan aur Laaj Raksha

द्रौपदी चीरहरण और लाज रक्षा

Mahabharat Kaal
Rakshabandhan — Krishna ka Draupadi ko Bahan Maanna

रक्षाबंधन — कृष्ण का द्रौपदी को बहन मानना

Mahabharat Kaal
Shantidoot Bankar Hastinapur Jaana

शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर जाना

Mahabharat Kaal
Vidur ke Ghar Saag Khaana aur Duryodhan ka Nimantran Thukraana

विदुर के घर साग खाना और दुर्योधन का निमंत्रण ठुकराना

Mahabharat Kaal
Darbaar Mein Viraat Roop Darshan

दरबार में विराट रूप दर्शन

Mahabharat Kaal
Geeta Updesh — Arjun ka Moh Bhang

गीता उपदेश — अर्जुन का मोह भंग

Mahabharat Kaal