
अर्धनारीश्वर स्वरूप — शिव और शक्ति का एकाकार रूप
Ardhanarishvara - The Union of Shiva and Shakti
सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी को रचना का कार्य सौंपा गया। उन्होंने ध्यान लगाकर मानसपुत्रों की रचना की — सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, तथा अनेक ऋषि और प्रजापति। परन्तु एक कठिनाई आ गई। ये सभी केवल मानसिक संकल्प से उत्पन्न हुए थे। इनमें आगे संतति उत्पन्न करने की शक्ति नहीं थी। जितने प्राणी ब्रह्मा जी बनाते, बस उतने ही रह जाते — सृष्टि आगे बढ़ ही नहीं पाती थी। ब्रह्मा जी चिंतित हो उठे और सोचने लगे कि वे रचना तो कर रहे हैं, पर यह रचना बढ़ती क्यों नहीं और कहीं उनसे कोई भूल तो नहीं हो रही।
ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु से मार्गदर्शन मांगा। विष्णु जी ने कहा कि आपने सृष्टि तो रच दी, परन्तु उसमें केवल पुरुष तत्व है। सृष्टि के विस्तार के लिए नारी तत्व अर्थात् शक्ति अनिवार्य है। पुरुष अकेला निष्क्रिय है, वह चेतना है परन्तु क्रिया नहीं। शक्ति के बिना वह कुछ रच नहीं सकता। अतः महादेव की आराधना कीजिए, वे ही इसका रहस्य प्रकट करेंगे।
ब्रह्मा जी ने दीर्घकाल तक भगवान शिव की कठोर आराधना की। उन्होंने प्रार्थना की कि हे महादेव! मैं जो रचता हूँ, वह वहीं ठहर जाता है। सृष्टि आगे नहीं बढ़ती। कृपा कर मुझे मार्ग दिखाइए। तब भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने एक ऐसा स्वरूप प्रकट किया जो ब्रह्मांड ने पहले कभी नहीं देखा था। एक ही देह, परन्तु दाहिना भाग पुरुष का और बायाँ भाग नारी का। दाहिनी ओर शिव थे — जटाजूट में चंद्रमा, गले में सर्प, त्रिशूल धारण किए, भस्म से लेपित, वीरता और वैराग्य का स्वरूप। बायीं ओर शक्ति थीं — केश सज्जित, कर्णफूल और वलय पहने, नेत्रों में कोमलता, हाथ में दर्पण या कमल, कोमलता और सृजन का स्वरूप। दोनों में कोई सीवन नहीं, कोई जोड़ नहीं — एक ही देह, एक ही प्राण। ब्रह्मा जी यह देखकर स्तब्ध रह गए। उन्हें उसी क्षण रहस्य समझ आ गया कि पुरुष और प्रकृति अलग-अलग सत्ता नहीं, एक ही सत्य के दो पक्ष हैं।
तभी उस स्वरूप के वाम भाग से माता शक्ति पृथक होकर प्रकट हुईं। ब्रह्मा जी ने उन्हें प्रणाम किया और प्रार्थना की कि हे जगदंबा! मेरी रचना में सृजन-शक्ति का संचार कीजिए। देवी ने प्रसन्न होकर अपनी शक्ति का अंश प्रदान किया। उसी से नारी तत्व की उत्पत्ति हुई और सृष्टि द्विगुणित होकर आगे बढ़ने लगी। तभी से संसार में सृजन की धारा अविरल चल पड़ी।
अर्धनारीश्वर स्वरूप से जुड़ी एक और प्रसिद्ध कथा भृंगी ऋषि की है। भृंगी नामक ऋषि शिव जी के परम भक्त थे, परन्तु उनकी भक्ति एकांगी थी। वे केवल शिव जी की परिक्रमा करना चाहते थे, माता पार्वती की नहीं। उनका मत था कि मेरे आराध्य केवल शिव हैं, मैं किसी और की परिक्रमा नहीं करूँगा। एक दिन जब शिव और पार्वती एक साथ आसन पर विराजमान थे, भृंगी परिक्रमा करने आए। पार्वती जी को बीच में देखकर उन्होंने भ्रमर का रूप धारण किया और दोनों के बीच से निकलकर केवल शिव जी की परिक्रमा कर ली। माता पार्वती को यह देखकर दुःख हुआ। उन्होंने भृंगी को समझाना चाहा, पर वे न माने। तब पार्वती जी ने शिव जी से प्रार्थना की और शिव जी ने अपने वाम अंग में पार्वती जी को समाहित कर अर्धनारीश्वर रूप धारण कर लिया। अब भृंगी असमंजस में पड़ गए कि परिक्रमा किसकी करें, क्योंकि शिव और शक्ति तो एक ही देह में थे।
भृंगी ने हठ नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने सूक्ष्म रूप से केवल शिव भाग की परिक्रमा करने का प्रयास किया। तब माता पार्वती ने अपनी शक्ति खींच ली। शरीर में जो भी मांस और रक्त था, वह शक्ति का अंश था, वह सब चला गया। भृंगी के शरीर में केवल अस्थियाँ और नाड़ियाँ शेष रह गईं। वे खड़े भी न हो सके और भूमि पर गिर पड़े। तब उन्हें बोध हुआ कि मैं कितना अज्ञानी था। शिव को शक्ति से अलग करके मैंने स्वयं को ही खंडित कर लिया। उन्होंने माता से क्षमा माँगी। करुणामयी पार्वती जी ने उन्हें क्षमा किया और शिव जी ने उन्हें एक तीसरा पैर दिया, जिससे वे तिपाई की भाँति खड़े हो सकें। तभी से यह शिक्षा प्रचलित हुई कि शिव और शक्ति की उपासना कभी अलग-अलग नहीं होती।
अर्धनारीश्वर केवल एक चित्र नहीं, एक गहन दर्शन है। पुरुष और प्रकृति, शिव चेतना हैं और शक्ति क्रिया हैं। चेतना बिना क्रिया के निष्क्रिय है और क्रिया बिना चेतना के अंधी। दोनों मिलकर ही सृष्टि है। कहा गया है कि शिव शब्द से यदि 'इ' निकाल दिया जाए, तो शेष रह जाता है 'शव'। अर्थात् शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हैं। यह स्वरूप स्पष्ट घोषणा है कि नारी पुरुष से न्यून नहीं, अपितु उसका आधा अंग है। जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ अर्धनारीश्वर का अपमान होता है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर दोनों तत्व हैं — कठोरता और कोमलता, वैराग्य और करुणा। जो इन दोनों में संतुलन साध ले, वही पूर्ण है।
अर्धनारीश्वर स्वरूप की स्तुति में आदि शंकराचार्य रचित 'अर्धनारीश्वर स्तोत्र' प्रसिद्ध है। इस स्वरूप की सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतिमाएँ एलीफेंटा गुफा तथा एलोरा में हैं। दक्षिण भारत में तिरुचेंगोडु के अर्धनारीश्वर मंदिर में इसी रूप की पूजा होती है। अंततः यह कथा हमें सिखाती है कि सृष्टि किसी एक तत्व से नहीं चलती। पूर्णता अकेलेपन में नहीं, मिलन में है। जो पुरुष स्त्री का सम्मान नहीं करता, वह अधूरा है। पूर्ण वही है जो दो को एक देख सके।