
अभिमन्यु और चक्रव्यूह
Abhimanyu aur Chakravyuh
अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा के वीर पुत्र थे, और भगवान श्रीकृष्ण के भानजे थे। कहते हैं कि जब अभिमन्यु माता सुभद्रा के गर्भ में थे, तब अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि सुना रहे थे। गर्भ में ही अभिमन्यु ने प्रवेश की विधि तो सीख ली, किंतु उसमें से बाहर निकलने की विधि सुनने से पहले ही सुभद्रा को निद्रा आ गई, अतः अभिमन्यु व्यूह से निकलना नहीं सीख पाए।
महाभारत के युद्ध में एक दिन गुरु द्रोणाचार्य ने कौरव सेना को अत्यंत दुर्भेद्य चक्रव्यूह की रचना में सजाया, जिसे तोड़ना अत्यंत कठिन था। उस दिन अर्जुन को संशप्तक योद्धाओं ने युद्ध में उलझाकर दूर कहीं और व्यस्त कर रखा था। पांडव सेना में केवल अर्जुन ही इस व्यूह को भेदकर बाहर निकलना जानते थे, और उनकी अनुपस्थिति में सारी सेना चिंतित हो उठी।
तब वीर बालक अभिमन्यु ने साहसपूर्वक आगे आकर कहा — "मैं इस चक्रव्यूह को भेदकर भीतर प्रवेश करना जानता हूँ। मैं भीतर घुसकर मार्ग बना दूँगा और आप सब मेरे पीछे-पीछे भीतर आ जाना।" युधिष्ठिर और अन्य वीरों ने उसे आश्वासन दिया कि वे सब उसके पीछे व्यूह में प्रवेश कर जाएँगे और उसकी रक्षा करेंगे।
अभिमन्यु ने अपने अद्भुत पराक्रम से चक्रव्यूह के द्वार को तोड़ डाला और वीरता से लड़ते हुए भीतर प्रवेश कर गया। किंतु ठीक उसी समय दुष्ट जयद्रथ ने, जिसे शिव का वरदान प्राप्त था, व्यूह के द्वार पर पांडव सेना को रोक लिया। भीम, युधिष्ठिर और अन्य वीर लाख प्रयास करके भी भीतर प्रवेश न कर सके, और वीर अभिमन्यु अकेला ही शत्रुओं के विशाल घेरे में घिर गया।
निहत्थे और अकेले होते हुए भी अभिमन्यु ने असीम वीरता दिखाई। उसने द्रोण, कर्ण, दुर्योधन जैसे महारथियों से एक साथ युद्ध किया और अनगिनत योद्धाओं का संहार कर दिया। किंतु महारथियों ने मिलकर, धर्मयुद्ध के सारे नियम तोड़कर, उस अकेले बालक पर एक साथ प्रहार किया। उसका धनुष तोड़ दिया गया, रथ नष्ट कर दिया गया, फिर भी वह रथ का पहिया उठाकर लड़ता रहा। अंततः इस अधर्मपूर्ण घेरे में वीर अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गया।
जब भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन को इस अन्यायपूर्ण मृत्यु का समाचार मिला, तो सारा पांडव शिविर शोक में डूब गया। अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि वे अगले ही दिन जयद्रथ का वध करेंगे। अभिमन्यु का यह बलिदान वीरता, साहस और कर्तव्यनिष्ठा का अमर उदाहरण बन गया।
इस लीला का भाव यही है कि सच्चा वीर परिणाम की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य के मार्ग पर निर्भय होकर बढ़ता है। अभिमन्यु ने अल्पायु में ही अद्भुत साहस दिखाकर यह सिद्ध कर दिया कि आयु नहीं, अपितु धर्म और वीरता ही मनुष्य को अमर बनाती है। उसका त्याग सदैव भक्तों के हृदय में श्रद्धा जगाता रहेगा।