Vari Jau Re Balihari Jau Re
वारि जाऊं रे बलिहारी जाऊं रे
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सतगुरु मेरी आत्मा, मैं संतन की देह।
रोम रोम में रम रया, ज्यूं बादल में मेह॥ दोहा
वारि जाऊं रे, बलिहारी जाऊं रे।
म्हारे सतगुरु आँगन आया, मैं वारि जाऊं रे॥ टेक॥
सतगुरु आँगन आया, मैं गंगा गोमती नहाया।
म्हारी निर्मल हो गयी काया, मैं वारि जाऊं रे॥1॥
सतगुरु दर्शन दिना, म्हारा भाग उदय कर दिना।
करम भरम सब छीना रे, मैं वारि जाऊं रे॥2॥
सखियाँ मिलकर आवो, केसर रा तिलक लगावो।
गुरुदेव ने बधावो रे, मैं वारि जाऊं रे॥3॥
सत्संग बण गई भारी, थे गावो मंगलचारी।
म्हारे खुली हिरदे री बारी रे, मैं वारि जाऊं रे॥4॥
जस दास नारायण गाया, चरणां मैं शीश झुकाया।
गुरुदेव ने रिझाया रे, मैं वारि जाऊं रे॥5॥
✍️ रचयिता: दास नारायण
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