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Sobhit Kar Navneet Liye

सोभित कर नवनीत लिए

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Sobhit Kar Navneet Liye
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सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए। चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए। लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए। कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए। धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥

इस भजन के बारे में

यह सुंदर भजन महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें बाल कृष्ण के अत्यंत मनमोहक रूप का वर्णन किया गया है। इस पद में कवि ने दिखाया है कि कैसे नन्हे कन्हैया अपने हाथों में मक्खन लिए घुटनों के बल चल रहे हैं और उनके मुख पर दही लगा हुआ है। उनके गालों पर गोरोचन का तिलक और माथे पर लटें ऐसी लग रही हैं मानो भंवरे फूलों का रस पीकर मस्त हो गए हों। यह भजन भगवान श्री कृष्ण के बाल-सौंदर्य और उनकी बाल-लीलाओं के प्रति भक्त के गहरे प्रेम को दर्शाता है।

भक्त इस भजन को मुख्य रूप से जन्माष्टमी, नंदोत्सव या किसी भी शुभ अवसर पर गाते हैं। इसे गाते समय मन में बाल-गोपाल की छवि को बसाने से हृदय में वात्सल्य और आनंद का संचार होता है। सूरदास जी कहते हैं कि कृष्ण की इस एक पल की झलक पाने के लिए सौ कल्पों का जीवन भी धन्य हो जाता है। यह भजन मन को शांति और भक्ति के सागर में डुबो देता है, जिससे भक्त को प्रभु की सामीप्य का अनुभव होता है।

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