Shiv

Nagar Mein Jogi Aaya

नगर में जोगी आया

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ऊँचे-ऊँचे मंदिर तेरे, ऊँचा है तेरा धाम। है कैलाश के वासी भोले, हम करते हैं तुझे प्रणाम।। श्लोक नगर में जोगी आया, भेद कोई समझ न पाया। अजब है तेरी माया, इसे कोई समझ न पाया। यशोदा के घर आया, सबसे बड़ा है तेरा नाम, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ ॥ टेक ॥ अंग विभूति, गले रुद्राक्ष माला, व्याघ्र चर्म लिपटायो। बाँका तिलक, भाल चंदमा, घर-घर अलख जगायो। नगर में जोगी आया, भेद कोई समझ न पाया। सबसे बड़ा है तेरा नाम, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ ॥1॥ ले भिक्षा निकली नंदरानी, कंचन थाल सजायो। दो भिक्षा जोगी आसन जायो, बालक मेरो डरायो। नगर में जोगी आया, भेद कोई समझ न पाया। सबसे बड़ा है तेरा नाम, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ ॥2॥ ना चाहिए तेरी दौलत दुनिया, ना ही कंचन माया। अपने लाला का दर्शन करा दे, मैं दर्शन को आया। नगर में जोगी आया, भेद कोई समझ न पाया। सबसे बड़ा है तेरा नाम, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ ॥3॥ पाँच बार परिक्रमा करके, शंखनाद बजायो। सूरदास बलिहारी कन्हैया की, जुग-जुग जिए तेरो लाला। नगर में जोगी आया, भेद कोई समझ न पाया। सबसे बड़ा है तेरा नाम, भोलेनाथ, भोलेनाथ, भोलेनाथ ॥4॥

✍️ रचयिता: सूरदास

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