Mangal Bhavan Amangal Hari
मंगल भवन अमंगल हारी
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मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ॥ दोहा ॥
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥ टेक ॥
धीरज धरम मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिये चारी ॥1॥
जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू।
सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू ॥2॥
जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति देखी तिन तैसी ॥3॥
रघुकुल रीत सदा चली आई।
प्राण जाए पर वचन न जाई ॥4॥
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता ॥5॥
राम सिया राम, सिया राम जय जय राम ॥6॥
✍️ रचयिता: तुलसीदास
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