Ram

Chanda Chhup Ja Re Badal Mein

चंदा छुप जा रे बादल में

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चंदा छुप जा रे बादल में, म्हारो राम गयो वनवास, म्हारो लखन गयो वनवास, चंदा छुप जा रे बादल में ॥ टेक ॥ राम बिना सूनी अयोध्या नगरी, लखन बिना सूनी माई, सीता बिना सूनी रसोई, कौन करे चतुराई ॥1॥ आगे-आगे राम चलत हैं, पीछे लक्ष्मण भाई, बीच-बीच में चलत जानकी, शोभा बरनी न जाई ॥2॥ सावन बरसे भादवो बरसे, पवन चले पुरवाई, वृक्ष के नीचे तीनों भीगे, राम लखन सीता माई ॥3॥ रावण मार राम घर आये, घर-घर बंटी बधाई, मात कौशल्या आरती उतारे, तुलसीदास जस गाई ॥4॥

✍️ रचयिता: तुलसीदास

इस भजन के बारे में

यह भजन भगवान श्री राम के वनवास के मार्मिक प्रसंग को समर्पित है। इसमें माता सीता की व्याकुलता और प्रेम को दर्शाया गया है, जहाँ वे चंद्रमा से बादलों में छिप जाने का आग्रह करती हैं क्योंकि राम और लक्ष्मण के वन जाने से अयोध्या सूनी हो गई है। यह भजन हमें प्रभु के प्रति अटूट समर्पण और उनके वियोग में होने वाली तड़प का अनुभव कराता है। इसमें राम, लक्ष्मण और सीता के वन गमन की सादगी और उनके आपसी प्रेम का सुंदर चित्रण है। भक्त इसे विशेष रूप से श्री राम नवमी या प्रभु के स्मरण के समय गाते हैं। इस भजन को गाने से मन में भक्ति का भाव जागृत होता है और हृदय में प्रभु के प्रति करुणा और प्रेम की वृद्धि होती है। यह हमें सिखाता है कि प्रभु के बिना जीवन का हर सुख अधूरा है और उनकी उपस्थिति ही सच्ची शांति है।

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