Ram

Kai Gun Gaan Karu Hari Tharo

काई गुण गान करूं हरि थारो

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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥ श्लोक काई गुण गान करूं हरि थारो, थां बिन जग में कोई नहीं म्हारो॥ टेक ॥ थे प्रभु गंगा मैं थ्हारो मीना, थां बिन म्हारा होय नहीं जीना। काई गुण गान करूं हरि थारो, थां बिन जग में कोई नहीं म्हारो॥1॥ थे प्रभु समदर मैं थ्हारो लहरी, थांरी तो म्हारी प्रीत है गहरी। काई गुण गान करूं हरि थारो, थां बिन जग में कोई नहीं म्हारो॥2॥ थे प्रभु पीपल मैं थ्हारो पत्तो, थ्हारो तो म्हारो एकल मत्तो। काई गुण गान करूं हरि थारो, थां बिन जग में कोई नहीं म्हारो॥3॥ थे प्रभु गैया मैं थ्हारो बाछो, दौड़ उछल कर आऊं मैं पाछो। काई गुण गान करूं हरि थारो, थां बिन जग में कोई नहीं म्हारो॥4॥ थे म्हारी जननी मैं थ्हारो जायो, राखो सदा हिवड़े लिपटायो। काई गुण गान करूं हरि थारो, थां बिन जग में कोई नहीं म्हारो॥5॥

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