संत हमारी आत्मा, मैं संतत की देह।
रोम रोम में राम रया, ज्यों बादल बिच मेह ॥ दोहा
लिख दो म्हारे रोम रोम में, राम राम हो रम्पति।
राम राम ओ आपपति, लिख दो जय सियाराम जी ॥ टेक ॥
शीश पे म्हारे शिव जी लिख दो, कानों में कन्हैया राम।
नैनों में नरसी बिलो लिख दो, नाक पे नन्दलाल राम।
लिख दो म्हारे रोम रोम में, राम राम हो रम्पति ॥1॥
होठों पे हरिहर लिख दो, दांतों पे दयालु राम।
जीभ पे जगदीश लिख दो, कंठ पे कमलापति राम।
लिख दो म्हारे रोम रोम में, राम राम हो रम्पति ॥2॥
गले पे गिरधारी लिख दो, मुख पर मुरली वालो राम।
भुजा पे भगवान लिख दो, हाथों पे हनुमाना राम।
लिख दो म्हारे रोम रोम में, राम राम हो रम्पति ॥3॥
छाती पे चतुर्भुज लिख दो, पेट में परमेश्वर राम।
जांघों पे जगदम्बा लिख दो, नाभि पे नारायण राम।
लिख दो म्हारे रोम रोम में, राम राम हो रम्पति ॥4॥
गोड़ां पे गोविन्दा लिख दो, पिण्डी में परमानन्द राम।
सुण्डी पे आशा गिरी लिख दो, चरणों में चारूं ही धाम।
लिख दो म्हारे रोम रोम में, राम राम हो रम्पति ॥5॥
इतरो तो लिख दीजो दाता, भव जळ पार उतारो राम।
लिखमां थारे शरणे आवे, एक अरज सुन लीजो राम।
लिख दो म्हारे रोम रोम में, राम राम हो रम्पति ॥6॥
✍️ रचयिता: लिखमां
इस भजन के बारे में
यह सुंदर भजन प्रभु श्री राम के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। इसमें भक्त अपने आराध्य से प्रार्थना करता है कि उनके शरीर के हर अंग में प्रभु का नाम अंकित हो जाए। इसका भाव यह है कि भक्त का रोम-रोम केवल राम नाम का ही स्मरण करे और उसका पूरा अस्तित्व भगवान की भक्ति में लीन हो जाए। यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर केवल बाहर नहीं, बल्कि हमारे कण-कण में बसे हैं।
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री राम और उनके विभिन्न स्वरूपों को समर्पित है। भक्त अपने शरीर के अंगों पर अलग-अलग देवताओं और प्रभु के नामों को लिखने की कल्पना करता है, जो इस बात का प्रतीक है कि हमारा शरीर एक मंदिर है। इसे अक्सर सत्संग, कीर्तन या एकांत में प्रभु का ध्यान करते समय गाया जाता है। इसे गाने से मन को असीम शांति मिलती है और भक्त का अहंकार मिटकर प्रभु के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव जागृत होता है।