Khijhat Jat Makhan Khat
खीझत जात माखन खात
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इस भजन के बारे में
यह सुंदर पद महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें उन्होंने बाल कृष्ण की माखन चोरी और उनकी बाल-लीलाओं का अत्यंत मनमोहक वर्णन किया है। इस भजन में बालक कृष्ण माखन खाते हुए अपनी नटखट अदाएं दिखा रहे हैं। कभी वे अपनी भौहें टेढ़ी करते हैं, तो कभी उबासी लेते हुए अपनी सुंदर आंखों को मलते हैं। धूल से सने हुए घुटनों के बल चलना और अपनी तोतली बोली में 'तात' (पिता) को पुकारना, यशोदा मैया के हृदय को आनंद से भर देता है। सूरदास जी कहते हैं कि कृष्ण की इस मोहक छवि को देखकर माता यशोदा एक पल के लिए भी उनसे अपनी नजरें नहीं हटा पातीं। यह भजन भगवान के बाल स्वरूप की सरलता और वात्सल्य रस को दर्शाता है। भक्त इस भजन को मुख्य रूप से जन्माष्टमी या कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर गाते हैं। इसे सुनने या गाने से मन में वात्सल्य भाव जागृत होता है और भक्त स्वयं को यशोदा मैया की तरह कृष्ण के प्रेम में डूबा हुआ महसूस करता है। यह भजन मन को शांति और आनंद प्रदान करने वाला है।
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