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Chali Braj Ghar Gharani Yah Baat

चली ब्रज घर घरनि यह बात

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Chali Braj Ghar Gharani Yah Baat
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चली ब्रज घर घरनि यह बात। नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात। कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ। कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ। कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम। हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम। कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि। कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि। सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार। जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥

इस भजन के बारे में

यह सुंदर भजन महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें ब्रज की गोपियों की बाल-कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति और वात्सल्य का वर्णन है। इस भजन का भावार्थ यह है कि पूरे ब्रज में यह चर्चा फैल गई है कि नटखट कन्हैया अपने सखाओं के साथ घर-घर जाकर माखन चुराकर खा रहे हैं। कोई गोपी कहती है कि वे मेरे घर में घुस आए थे, तो कोई कहती है कि मुझे देखते ही वे भाग गए। गोपियों की यह शिकायत वास्तव में उनका प्रेम है; वे चाहती हैं कि कान्हा उनके घर आएं और वे उन्हें प्रेम से माखन खिला सकें। वे उन्हें अपनी बाहों में भरकर रखना चाहती हैं और उन्हें बांधकर अपने पास बिठाने की कल्पना करती हैं। यह भजन भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं और भक्तों के उस निश्छल प्रेम को दर्शाता है, जहाँ भक्त अपने आराध्य को केवल अपना मानकर उनसे लाड़-प्यार करना चाहता है। भक्त इस भजन को विशेष रूप से जन्माष्टमी या कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर गाते हैं। इसे गाते समय मन में कृष्ण के प्रति वात्सल्य भाव जागृत होता है और भक्त स्वयं को ब्रज की गोपियों की तरह कृष्ण के सानिध्य में अनुभव करता है। इस भजन को गाने से मन में आनंद और सात्विक प्रेम का संचार होता है, जो भक्त को भगवान के बाल-स्वरूप के और करीब ले जाता है।

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