Shiv

Bhole Ji Ke Sheesh Jhukale

भोले जी के शीश झुकाले

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भोले जी के चरणों में शीश झुकाले, मन चाहा वरदान आज तूं पाले। नीलकंठ महादेव की है रे लीला न्यारी ॥ टेक ॥ नन्दी के असवार को शीश झुकालो आज तुम। गिरिजापति महादेव को, राजी कर लो आज तुम। कावड़िया की डोली तूं शिव को चढ़ा, भंगिया की गोली तूं शिव को खिला शिव खुश होंगे तो, मानो सफल जिन्दगानी भोले जी के चरणों में ॥1॥ जो माँगो वो मिल जायेगा, इनके खुले खजाने में। कर देखो अरदास, तुम शिवजी के दरबार में। कैलाश के नाथ हैं भोले, भक्तों के पालक हैं भोले, मनोज के संग तूं संजू कर ले शिव की भक्ति भोले जी के चरणों में ॥2॥

✍️ रचयिता: मनोज

इस भजन के बारे में

यह भजन भगवान शिव की महिमा और उनकी शरण में जाने का आह्वान करता है। इसका भावार्थ यह है कि जो भक्त सच्चे मन से महादेव के चरणों में अपना शीश झुकाता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। नीलकंठ महादेव की लीला अत्यंत निराली है और वे अपने भक्तों के दुखों को हरने वाले हैं। भजन में नंदी के असवार, गिरिजापति और कैलाश के नाथ के रूप में शिव की स्तुति की गई है, जो हमें सिखाती है कि श्रद्धा और प्रेम के साथ की गई छोटी सी पूजा भी प्रभु को प्रसन्न कर सकती है।

भक्त इस भजन को विशेष रूप से सावन के महीने, शिवरात्रि या कांवड़ यात्रा के दौरान गाते हैं। इसे गाने का मुख्य उद्देश्य मन की शांति और शिवजी की कृपा प्राप्त करना है। जब हम शिवजी के दरबार में अपनी अरदास लेकर जाते हैं, तो वे अपने भक्तों की झोली खुशियों से भर देते हैं। यह भजन हमें याद दिलाता है कि शिवजी की भक्ति ही जीवन की सार्थकता है और उनके द्वार पर जाने से भक्त को वह सब कुछ प्राप्त होता है जिसकी वह कामना करता है।

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