Khatu Shyam

Bhar De Re Jholi Meri

भर दे रे झोली मेरी

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यहीं चलाएँ · Play here
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मैं यह नहीं चाहता कि तू इनकार करे बाबा। खाली झोली भरदे मेरी इन्तजार है बाबा॥ दोहा भरदे रे भरदे रे झोली मेरी, लखदातार। झोली पड़ी है मेरी कबसे खाली, भरदे रे॥ टेक॥ शरण पड़े की लाज राखले हो दाता, हो दाता। घणी दूर से पैदल आयो हो दाता। इज्जत से मुझको बुलवाले हो दाता। सबसे पीछे मैं जो खड़ा हूँ हो दाता। कबसे खड़ा हूँ, फूटी कौड़ी कौन बापरी, भरदे रे, भरदे रे॥1॥ संकट ने मुझे घेर लिया है हो दाता। दीन दुखी दरिद्र बना मैं हो दाता। ठोकर खाता दर-दर की मैं हो दाता। मैं बालक हूँ नादान सुध ले हो दाता। अटकी नैया पार कर दे शीश का दानी, भरदे रे, भरदे रे॥2॥ सब देवों में दानी बड़ा है तू दाता। सबकी आशा तुझसे लगी है हो दाता। 'मनोज' तेरी शरण में आया हो दाता। नृसिंह मण्डल तेरे ध्वजा लाया हो दाता। प्रजा तेरे से सारी यही वर माँग रही, भरदे रे, भरदे रे॥3॥

✍️ रचयिता: मनोज

इस भजन के बारे में

यह भजन खाटू श्याम जी, जिन्हें 'लखदातार' और 'शीश के दानी' के नाम से जाना जाता है, को समर्पित है। इस भजन का भावार्थ एक भक्त की व्याकुल पुकार है, जो अपने आराध्य के सामने अपनी खाली झोली लेकर खड़ा है। भक्त बाबा से प्रार्थना करता है कि वह उसकी दीन-हीन अवस्था को देखें और अपनी कृपा से उसके जीवन के संकटों को दूर करें। यह भजन उस अटूट विश्वास को दर्शाता है कि बाबा अपने शरण में आए हर भक्त की लाज रखते हैं और उनकी नैया को पार लगाते हैं।

भक्त इसे विशेष रूप से खाटू श्याम जी की पदयात्रा के दौरान या उनके दरबार में गाते हैं। जब मन में निराशा हो या जीवन में कष्ट बढ़ जाएं, तब इस भजन को गाने से मन को असीम शांति और संबल मिलता है। यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर के सामने अहंकार छोड़कर एक नादान बालक की तरह अपनी झोली फैलाना ही सच्ची भक्ति है। इसे गाते समय भक्त का भाव यही होता है कि बाबा उसकी पुकार सुनकर उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें और उसे अपनी छत्रछाया में ले लें।

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