Khatu Shyam

Surat Sanwali

सूरत साँवली

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यहीं चलाएँ · Play here
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मिल गयी जीवन जेवड़ी, लड़्या नैन सूं नैन। दिन पर्वत सा बन गया, भई छै मासी रैन॥ दोहा थां बिन म्हारी आंख्यां हो गयी बावली। ई टाबर के मन में बस गयी सूरत थारी साँवली ॥ टेक ॥ हिवड़ो म्हारो सूनो डोले, डगमग झोला खावे है। आंखड़ल्या बिरहा की मारी, आंसूडा टपकावे है। कैया चलसी थां बिन म्हारी गाड़ली ॥1॥ मीरां पर कृपा कीनी थी, सुणबा आयो बातड़ली। दास थारो यो आश लगाया, खड़्यो उडि़के बातड़ली। प्रेम जाम से भरदे म्हारी बाटली ॥2॥ पेल्यां प्रीत लगायके पाछे क्यूं छोड़े मझधार जी। प्रेम भाव को पाठ पढ़ाकर मत बिसरै दिलदार जी। मन में रम गयी सूरत थारी साँवली ॥3॥ थे छोड़ो पण मैं ना छोड़ूं मैं तो थारे साथ जी। खाटू के घनश्याम मुरारी मैं तो थारो दासजी। 'आलूसिंह' की थां बिन आंख्यां बावली ॥4॥

✍️ रचयिता: आलूसिंह

इस भजन के बारे में

यह भजन खाटू श्याम जी के प्रति एक भक्त की गहरी तड़प और अटूट प्रेम को दर्शाता है। इसमें भक्त अपने आराध्य की सांवली सूरत के प्रति अपनी व्याकुलता व्यक्त करता है और कहता है कि उनके बिना उसका मन और आंखें बावली हो गई हैं। यह रचना विरह की उस अवस्था को बयां करती है जहाँ भक्त को अपने प्रभु के बिना हर पल पहाड़ जैसा भारी लगता है। यह भजन मुख्य रूप से खाटू श्याम जी को समर्पित है, जिसमें भक्त मीराबाई की तरह ही प्रभु से मिलने की आस लगाए बैठा है। भक्त प्रभु से प्रार्थना करता है कि जिस तरह उन्होंने मीरा पर कृपा की, वैसे ही वे उसके जीवन के सूनेपन को अपने प्रेम से भर दें। इसे अक्सर तब गाया जाता है जब भक्त का मन प्रभु के वियोग में व्याकुल हो या वह अपनी भक्ति को और गहरा करना चाहता हो। इस भजन को गाने से मन को शांति मिलती है और प्रभु के प्रति समर्पण का भाव जागृत होता है। यह हमें सिखाता है कि चाहे दुनिया साथ छोड़ दे, पर भक्त को कभी भी अपने प्रभु का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

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