
यमलार्जुन उद्धार — नलकूबर-मणिग्रीव की श्राप मुक्ति
Yamalarjun Uddhar - Nalakubar-Manigriva ki Shraap Mukti
जब यशोदा माता ने बालकृष्ण को ऊखल से बाँध दिया और स्वयं गृह-कार्य में लग गईं, तब नन्हे कान्हा उस भारी ऊखल को घसीटते हुए आँगन से बाहर की ओर बढ़ चले। नंद-भवन के आँगन में परस्पर सटे हुए दो विशाल यमलार्जुन नामक अर्जुन वृक्ष खड़े थे। कान्हा उन दोनों वृक्षों के बीच से ऊखल को खींचते हुए निकलने लगे। ऊखल तिरछा होकर उन दोनों वृक्षों के बीच अटक गया।
नन्हे श्रीकृष्ण ने जब उस अटके हुए ऊखल को अपनी ओर एक झटके से खींचा, तो दोनों विशाल वृक्ष जड़ से उखड़कर भयंकर आवाज़ के साथ धरती पर गिर पड़े। धूल का बवंडर उठा और सारा गोकुल उस भयानक कड़कड़ाहट से गूँज उठा। उन गिरे हुए वृक्षों में से दो तेजस्वी दिव्य पुरुष प्रकट हुए और उन्होंने हाथ जोड़कर, मस्तक झुकाकर भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की।
इन दोनों की कथा बड़ी शिक्षाप्रद है। ये दोनों कुबेर के पुत्र थे — नलकूबर और मणिग्रीव। धन, ऐश्वर्य और यौवन के मद में चूर होकर एक बार ये देवियों के साथ मंदाकिनी नदी में जल-क्रीड़ा कर रहे थे। तभी वहाँ देवर्षि नारद पधारे। मद और अहंकार में डूबे होने के कारण इन दोनों ने न तो देवर्षि का सम्मान किया, न ही निर्वस्त्र होने पर उन्हें लज्जा हुई, बल्कि वे उपेक्षा करते रहे।
देवर्षि नारद ने देखा कि धन और अभिमान ने इनकी बुद्धि हर ली है। उनके मन में इन दोनों के कल्याण की भावना जागी। उन्होंने अनुग्रहपूर्वक शाप दिया कि "तुम दोनों जड़ता के प्रतीक इन अर्जुन वृक्षों की योनि को प्राप्त करो, ताकि तुम्हारा अहंकार नष्ट हो।" साथ ही करुणावश यह वरदान भी दिया कि "एक दिन साक्षात भगवान श्रीकृष्ण गोकुल में अवतार लेंगे और अपने चरण-स्पर्श से तुम्हें इस योनि से मुक्त कर, अपनी भक्ति प्रदान करेंगे।" इसी शाप के कारण वे दोनों सौ वर्षों तक अर्जुन वृक्ष बनकर नंद-आँगन में खड़े रहे और भगवान की प्रतीक्षा करते रहे।
अब जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने चरणों की कृपा से उन वृक्षों को गिराकर दोनों का उद्धार किया, तो नलकूबर और मणिग्रीव ने प्रभु के चरणों में प्रणाम करके स्तुति की — "हे प्रभु, आपने हमें अज्ञान और अभिमान के बंधन से मुक्त कर दिया। नारद जी की कृपा से ही आज हमें आपके दर्शन का सौभाग्य मिला। अब हम पर कृपा करें कि हमारी वाणी सदा आपकी लीलाओं का गान करे और हमारा मन आपके चरणों में लगा रहे।" ऐसा कहकर, प्रभु से प्रेम-भक्ति का वरदान पाकर वे दोनों अपने लोक को लौट गए।
इसी बीच उस भयंकर शब्द को सुनकर नंदबाबा, यशोदा और गोकुलवासी दौड़े हुए आए। उन्होंने देखा कि दो विशाल वृक्ष उखड़ पड़े हैं और उनके बीच ऊखल से बँधा नन्हा कान्हा निर्भय होकर मुस्करा रहा है। सबने ईश्वर का धन्यवाद किया कि बालक सकुशल है, और यशोदा ने प्रेमपूर्वक लल्ला को बंधन से मुक्त कर गोद में भर लिया।
यह लीला यह भाव प्रकट करती है कि धन और अभिमान मनुष्य को जड़ता की ओर ले जाते हैं, जबकि संतों का शाप भी वास्तव में उद्धार का ही साधन बन जाता है। भगवान अपने भक्तों को कभी नहीं भूलते; समय आने पर वे अवश्य आते हैं और अपने चरण-स्पर्श से उद्धार करते हैं। जय गोविंद।