
मिट्टी खाना और यशोदा को मुख में ब्रह्मांड दर्शन
Mitti Khana aur Yashoda ko Mukh mein Brahmand Darshan
गोकुल में बालकृष्ण अब घुटनों के बल आँगन में इधर-उधर दौड़ने लगे थे और अपने भाई बलराम तथा ग्वाल-बालों के संग नाना प्रकार की बाल-लीलाएँ करते थे। नटखट कान्हा की चंचलता का कोई पार न था — कभी वे गौओं के बछड़ों के पीछे दौड़ते, कभी धूल में लोटते और कभी अपने संगी बालकों के साथ खेल में मग्न हो जाते। इन्हीं बाल-क्रीड़ाओं के बीच एक दिन खेलते हुए कान्हा ने अपने मुख में थोड़ी मिट्टी डाल ली।
बलराम और साथ खेल रहे ग्वाल-बालकों ने यह देख लिया और दौड़कर यशोदा माता से शिकायत कर दी — "माँ, तुम्हारे लल्ला ने मिट्टी खा ली है।" यह सुनकर यशोदा माता चिंतित और थोड़ी क्रोधित हो उठीं। वे भयभीत भी हुईं कि कहीं मिट्टी खाने से उनके लाल को कोई हानि न हो जाए। वे कान्हा के पास आईं और डाँटते हुए बोलीं — "अरे नटखट! तूने मिट्टी क्यों खाई?"
नन्हे श्रीकृष्ण, जो सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं, बड़ी भोली-सी मुद्रा में अपनी सफ़ाई देने लगे। उन्होंने कहा — "माँ, मैंने मिट्टी नहीं खाई। ये सब झूठ बोलते हैं। यदि तुम्हें विश्वास न हो तो स्वयं मेरा मुख देख लो।" यह कहकर लल्ला ने अपना कोमल मुख खोल दिया। माता यशोदा जब उस नन्हे मुख के भीतर झाँकने लगीं, तो जो दृश्य उन्होंने देखा, उससे उनका मन विस्मय के सागर में डूब गया।
उस छोटे-से मुख के भीतर यशोदा माता ने सम्पूर्ण चराचर ब्रह्मांड का दर्शन किया। वहाँ आकाश, दिशाएँ, पर्वत, समुद्र, द्वीप, सूर्य-चंद्र, तारागण, वायु, अग्नि, समस्त लोक और प्राणी — सब कुछ विद्यमान थे। इतना ही नहीं, उन्हें उसी मुख में गोकुल, अपना नंद-भवन और स्वयं अपने आपको भी लल्ला के मुख में झाँकते हुए दिखाई पड़ा। यह अद्भुत विराट दर्शन देखकर यशोदा स्तंभित रह गईं और उनका हृदय काँप उठा।
क्षण भर के लिए यशोदा माता को यह ज्ञान हुआ कि उनका यह पुत्र कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि साक्षात परब्रह्म परमेश्वर है। परंतु जिस माता को भगवान अपने वात्सल्य-भाव से बाँधना चाहते थे, उसे वे इस ज्ञान में अधिक समय बँधे नहीं रहने देना चाहते थे। अतः भगवान ने अपनी योगमाया का प्रसार किया, जिससे यशोदा उस दिव्य दर्शन को भूल गईं और पुनः पुत्र-स्नेह के वात्सल्य में डूब गईं। उन्होंने प्रेम-विह्वल होकर लल्ला को गोद में उठा लिया और मस्तक चूम लिया।
यह लीला यह गूढ़ भाव प्रकट करती है कि जिस परमात्मा में अनंत ब्रह्मांड समाया है, वही भक्त के प्रेम में बँधकर उसका पुत्र बनकर लीला करते हैं। भगवान ज्ञान से नहीं, प्रेम और भाव से वश में होते हैं। यशोदा का वात्सल्य ऐश्वर्य-ज्ञान से भी बड़ा सिद्ध हुआ। यह कथा हमें सिखाती है कि सरल, निष्कपट प्रेम ही प्रभु को पाने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। जय यशोदानंदन।