Ookhal Bandhan (Damodar Leela)

ऊखल बंधन (दामोदर लीला)

Ookhal Bandhan (Damodar Leela)

एक दिन प्रातःकाल यशोदा माता स्वयं अपने हाथों से दही मथकर मक्खन निकाल रही थीं। वे मथानी चलाते हुए मन में अपने लाल की मधुर लीलाओं का स्मरण कर रही थीं। तभी नींद से जागकर भूखे कान्हा अपनी माता के पास आए और स्तनपान की इच्छा से हठ करने लगे। यशोदा ने प्रेमपूर्वक लल्ला को गोद में लेकर दूध पिलाना आरंभ किया।

इसी बीच चूल्हे पर रखा हुआ दूध उफनने लगा। यशोदा माता ने दूध को उतारने के लिए कान्हा को बीच में ही गोद से उतार दिया और चूल्हे की ओर दौड़ गईं। अपनी बात बीच में ही छूट जाने से रूठे हुए कान्हा को यह अच्छा न लगा। क्रोध में उन्होंने पास रखी मक्खन की मटकी को एक पत्थर से फोड़ दिया और स्वयं माखन खाने तथा बंदरों को खिलाने लगे।

जब यशोदा माता लौटीं और उन्होंने फूटी मटकी तथा बिखरा माखन देखा, तो वे बालक की शरारत पर एक छड़ी लेकर उसे दंड देने आगे बढ़ीं। कान्हा भयभीत होकर "माँ-माँ" कहते हुए भागने लगे और यशोदा उनके पीछे-पीछे दौड़ीं। दौड़ते-दौड़ते माता थक गईं, उनका शरीर पसीने से भीग गया और केश खुलकर बिखर गए। अंततः उन्होंने अपने लाल को पकड़ लिया। कान्हा की भयभीत, रोती हुई आँखें और आँसुओं से भरा मुख देखकर माता का हृदय प्रेम से पिघल गया, फिर भी उन्होंने सोचा कि लल्ला को थोड़ा सुधारना आवश्यक है।

यशोदा माता ने निश्चय किया कि वे कान्हा को एक बड़े ऊखल (लकड़ी की भारी ओखली) से बाँध देंगी, ताकि वह भागकर और शरारत न कर सके। वे रस्सी लेकर लल्ला के पेट के चारों ओर बाँधने लगीं, परंतु रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ गई। उन्होंने और रस्सी जोड़ी, फिर और जोड़ी, परंतु प्रत्येक बार वह ठीक दो अंगुल छोटी रह जाती। घर की सारी रस्सियाँ जोड़ देने पर भी वे कान्हा को बाँध न सकीं। माता आश्चर्य और थकान से पसीने-पसीने हो गईं।

अपनी माता का यह अथक परिश्रम और वात्सल्य-भरा प्रयास देखकर भगवान का करुणामय हृदय द्रवित हो उठा। जो अनंत, असीम और किसी बंधन में न बँधने वाले हैं, वे स्वयं अपनी भक्त-माता के प्रेम-बंधन में बँध जाने को तैयार हो गए। भगवान ने अपनी कृपा से स्वयं को बँधने दिया और यशोदा माता ने उन्हें ऊखल से बाँध दिया। उदर (पेट) पर रस्सी के बंधन के कारण उस दिन से भगवान का एक मधुर नाम पड़ा — "दामोदर" (दाम अर्थात रस्सी, उदर अर्थात पेट)।

यह लीला यह अनुपम भाव प्रकट करती है कि जिस परमात्मा को बड़े-बड़े योगी, तपस्वी और ज्ञानी अपने संयम से नहीं बाँध पाते, उसे यशोदा माता ने केवल अपने निश्छल वात्सल्य से बाँध लिया। भगवान बल से नहीं, प्रेम से बँधते हैं। यही दामोदर लीला हमें सिखाती है कि सच्चा भक्ति-प्रेम ही प्रभु को अपने वश में करने वाली एकमात्र रस्सी है। जय दामोदर भगवान।

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