
शकटासुर वध — छकड़ा उलटना
Shakatasur Vadh - Chhakda Ulatna
गोकुल में बालकृष्ण के आगमन के पश्चात नंदबाबा के घर मंगल ही मंगल था। जब लल्ला तीन मास के हुए और करवट लेने योग्य हो चले, तब यशोदा माता ने पुत्र के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में एक शुभ उत्सव मनाने का निश्चय किया। इस अवसर पर ब्राह्मणों को भोजन कराया गया, वेद-मंत्रों का पाठ हुआ, दान-पुण्य किए गए और गोकुल की गोपियाँ मंगल-गीत गाने लगीं। घर आँगन उत्सव की धूम से भर उठा और सर्वत्र आनंद का वातावरण छा गया।
उत्सव की व्यस्तता में यशोदा माता ने नन्हे कान्हा को एक छकड़े (बैलगाड़ी) के नीचे पालने में सुला दिया, जिसमें दूध, दही और घृत के भारी घड़े लदे हुए थे। लल्ला को स्नान कराकर, वस्त्र पहनाकर वे उसे वहीं छाया में लिटाकर स्वयं अतिथियों की सेवा और उत्सव की तैयारी में लग गईं। नन्हे बालक को नींद आने लगी और वह पालने में हाथ-पैर चलाने लगा।
उधर कंस का भेजा हुआ शकटासुर नामक असुर उस छकड़े में प्रवेश कर चुका था। उसने सोचा कि इस भारी गाड़ी को शिशु के ऊपर गिराकर वह उसका अंत कर देगा। परंतु जब भूख से व्याकुल बालक श्रीकृष्ण ने दूध पीने की इच्छा से रोते हुए अपने कोमल चरण ऊपर की ओर उछाले, तो उन नन्हे चरणों का स्पर्श उस छकड़े को लग गया।
जो चरण सम्पूर्ण ब्रह्मांड का भार धारण करते हैं, उनका स्पर्श पाते ही वह भारी छकड़ा एक झटके में उलट गया। उसके पहिए टूटकर बिखर गए, अक्ष (धुरा) चटक गई और दूध-दही के सारे घड़े फूटकर चारों ओर लुढ़क गए। शकटासुर का असुर-रूप छिन्न-भिन्न होकर वहीं नष्ट हो गया और उसे प्रभु के चरण-स्पर्श से गति प्राप्त हुई।
इस विचित्र घटना का शब्द सुनकर यशोदा माता और नंदबाबा दौड़े हुए आए। उन्होंने देखा कि भारी छकड़ा उलटा पड़ा है और बालक निर्भय होकर पैर चला रहा है। वे भय और चिंता से व्याकुल हो उठे कि यह अनहोनी कैसे हुई। तभी वहाँ खेल रहे कुछ छोटे ग्वाल-बालों ने कहा कि "इस लल्ला ने ही अपने पैर से इस गाड़ी को उलट दिया।" परंतु बड़ों को उन भोले बालकों की बात पर विश्वास न हुआ। यशोदा ने डरे हुए मन से लाल को गोद में उठा लिया, ब्राह्मणों से रक्षा-मंत्र पढ़वाए, दही-अक्षत से बालक की नज़र उतारी और गौ-दान किया।
यह लीला यह महिमा प्रकट करती है कि भगवान श्रीकृष्ण भले ही बालक-रूप में लीला कर रहे थे, परंतु वे स्वयं सृष्टि के स्वामी हैं। उनके कोमल चरण-स्पर्श से ही अधर्म रूपी असुर नष्ट हो जाता है। भक्त को चाहिए कि वह प्रभु के इन बाल-चरणों का ध्यान करे, क्योंकि जो चरण असुरों का नाश और भक्तों की रक्षा करते हैं, उन्हीं की शरण में परम कल्याण है। जय यशोदानंदन।