
पूतना वध — विषैला स्तनपान और मोक्ष
Putana Vadh - Vishaila Stanpaan aur Moksh
मथुरा के कारागार में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया और वसुदेव जी उन्हें गोकुल में नंदबाबा के घर पहुँचा आए, तब सारा गोकुल आनंद के सागर में डूब गया। नंद-यशोदा के आँगन में लल्ला की किलकारियाँ गूँजने लगीं, ग्वाल-बालों के मुख पर हँसी खिल उठी और गोकुल की गलियाँ मंगल-गीतों से भर गईं। परंतु मथुरा में बैठा क्रूर कंस भयभीत था, क्योंकि आकाशवाणी ने उसे बता दिया था कि उसका काल गोकुल में जन्म ले चुका है। कंस ने अपनी माया-विद्या में निपुण, बालकों का संहार करने वाली राक्षसी पूतना को गोकुल भेजा, ताकि वह नवजात शिशुओं को मारकर उसके शत्रु का भी अंत कर दे।
पूतना अपनी मायावी शक्ति से एक अत्यंत सुंदर, ममतामयी स्त्री का रूप धारण करके गोकुल में आ पहुँची। उसका मनोहर रूप, कोमल वाणी और वात्सल्य-भरा व्यवहार देखकर किसी को भी संदेह न हुआ। वह सहज ही नंद के भवन में प्रवेश कर गई। पालने में लेटे हुए शिशु श्रीकृष्ण उसे देखकर मंद-मंद मुस्काए, मानो जानते हों कि उसका अंत निकट है। यशोदा और रोहिणी भी उस सुंदरी को देखकर सहज ही स्नेह में भर गईं और उसे रोका नहीं।
पूतना ने अपने स्तन पर तीव्र विष लगा रखा था। उसने बड़े प्रेम का ढोंग करते हुए बालक श्रीकृष्ण को गोद में उठाया और स्तनपान कराने लगी, इसी विचार से कि विष के प्रभाव से शिशु का प्राणांत हो जाएगा। परंतु जो सम्पूर्ण जगत के पालनहार हैं, उन प्रभु ने आँखें मूँदकर उसका स्तनपान आरंभ किया और विष के साथ-साथ उसके प्राणों को भी खींच लिया। पूतना पीड़ा से व्याकुल होकर "छोड़ दो, छोड़ दो" पुकारने लगी, परंतु प्रभु ने उसे न छोड़ा।
अत्यंत वेदना से तड़पती हुई पूतना अपने विशाल, भयंकर राक्षसी रूप में प्रकट हो गई और धरती पर गिर पड़ी। उसका विराट शरीर कोसों तक फैल गया, वृक्ष उखड़ गए और गोकुल थर्रा उठा। किंतु आश्चर्य यह कि उस विशाल देह के ऊपर बैठे नन्हे कान्हा निर्भय होकर खेल रहे थे। घबराई हुई यशोदा और गोपियाँ दौड़ीं और भयभीत मन से लाल को गोद में उठा लिया। उन्होंने गौ की पूँछ फिराकर, गोबर और मंत्रों से बालक की रक्षा-विधि की और मंगल-कामना की।
ग्वालों ने पूतना के उस विशाल शरीर को कुल्हाड़ियों से काटकर दूर ले जाकर जला दिया। और यहाँ एक अद्भुत महिमा प्रकट हुई — जलते हुए उस राक्षसी देह से चंदन जैसी सुगंध फैलने लगी। कारण यह था कि जिस स्तन से उसने प्रभु को मारना चाहा था, उसी स्तन से भगवान ने उसका पान किया, अतः वह माता के समान गति को प्राप्त हुई। जो विष देने आई थी, उसे भगवान ने अपनी करुणा से मोक्ष प्रदान कर दिया।
यह लीला हमें यह भाव सिखाती है कि भगवान की शरण में जो भी आता है — चाहे किसी भी भाव से — प्रभु उसका उद्धार कर देते हैं। पूतना का हृदय कपट से भरा था, फिर भी उसने माँ के रूप में स्तनपान कराया, तो भगवान ने उसे माता की गति दी। प्रभु की करुणा अपार है; वे भाव के भूखे हैं और शरणागत के परम रक्षक। जय श्रीकृष्ण।