Vinayak Chaturthi Vrat Katha

विनायक चतुर्थी व्रत कथा

Vinayak Chaturthi Vrat Katha

जिस प्रकार कृष्ण पक्ष की चतुर्थी "संकष्टी चतुर्थी" कहलाती है, उसी प्रकार प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि "विनायक चतुर्थी" के नाम से जानी जाती है। "विनायक" श्रीगणेश का ही एक प्रिय नाम है, जिसका अर्थ है — जिसका कोई स्वामी न हो, जो स्वयं सबका नायक हो। इस दिन गणपति की आराधना करने से बुद्धि, विवेक, विद्या और सिद्धि की प्राप्ति होती है।

इस व्रत की महिमा की एक कथा इस प्रकार है। प्राचीन काल में एक नगर में एक निर्धन ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। दरिद्रता के कारण उनका जीवन अत्यन्त कष्टमय था। एक दिन एक विद्वान मुनि उनके द्वार पर आए। ब्राह्मण दम्पति ने श्रद्धापूर्वक उनका सत्कार किया। मुनि ने उनकी दीनता देखकर उन्हें विनायक चतुर्थी के व्रत का विधान बताया और कहा — "यदि तुम श्रद्धा से यह व्रत करोगे तो विघ्नहर्ता गणेश तुम्हारे सारे कष्ट हर लेंगे।"

ब्राह्मण दम्पति ने मुनि की आज्ञा शिरोधार्य कर पूरी निष्ठा से विनायक चतुर्थी का व्रत आरम्भ किया। प्रत्येक मास की शुक्ल चतुर्थी को वे उपवास रखते, गणपति का पूजन करते, दूर्वा और मोदक अर्पित करते और मध्याह्न में चन्द्रमा के बिना ही, दिन के प्रकाश में पूजन सम्पन्न करते। धीरे-धीरे उनकी श्रद्धा और नियम से गणपति प्रसन्न हुए।

कुछ ही समय में उनके जीवन में परिवर्तन आने लगा। ब्राह्मण को सम्मानजनक कार्य मिला, घर में धन-धान्य की वृद्धि हुई और उन्हें एक सुयोग्य सन्तान की भी प्राप्ति हुई। जो घर कभी दरिद्रता से घिरा था, वहाँ अब सुख, शान्ति और समृद्धि का वास हो गया। ब्राह्मण दम्पति समझ गए कि यह सब विनायक चतुर्थी के व्रत और गणपति की कृपा का ही फल है।

विनायक चतुर्थी की व्रत विधि विशेष है। इस दिन का पूजन मध्याह्न काल में किया जाता है, क्योंकि गणेशजी का जन्म मध्याह्न में ही माना जाता है। भक्त प्रातः स्नान कर संकल्प लेते हैं, गणपति की प्रतिमा या चित्र का षोडशोपचार पूजन करते हैं, इक्कीस दूर्वा, लाल पुष्प, सिन्दूर और इक्कीस मोदक अर्पित करते हैं तथा गणेश स्तोत्र एवं "ॐ गं गणपतये नमः" मन्त्र का जप करते हैं।

विशेष रूप से विद्यार्थियों, साधकों और नए कार्य का आरम्भ करने वालों के लिए यह व्रत अत्यन्त कल्याणकारी माना जाता है। जिनकी बुद्धि मन्द हो, स्मरणशक्ति कमजोर हो अथवा कार्यों में बार-बार विघ्न आते हों, उनके लिए विनायक चतुर्थी का व्रत रामबाण के समान है।

जो भक्त सच्चे मन से विनायक चतुर्थी का व्रत करता है, उसके जीवन से विघ्न दूर होते हैं, बुद्धि निर्मल होती है और हर कार्य में सफलता मिलती है। यही इस व्रत की अनुपम महिमा है — विनायक की कृपा से मार्ग के सारे काँटे स्वयं ही दूर हट जाते हैं।

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