
गणेश चतुर्थी / गणेशोत्सव की कथा
Ganesh Chaturthi / Ganeshotsav Ki Katha
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को समस्त भारतवर्ष में "गणेश चतुर्थी" के रूप में अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसी दिन विघ्नहर्ता श्रीगणेश का प्राकट्य हुआ था, इसलिए यह तिथि गणपति का जन्मोत्सव मानी जाती है। घर-घर और गली-गली में गजानन की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं और दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व "गणेशोत्सव" कहलाता है।
गणेशजी के प्राकट्य की कथा अत्यन्त मनोहर है। एक बार माता पार्वती स्नान करने से पूर्व अपने शरीर के उबटन से एक सुन्दर बालक का निर्माण कर उसमें प्राण फूँक दिए। उन्होंने बालक को द्वार पर पहरे पर बिठाकर आज्ञा दी कि जब तक वे स्नान करें, किसी को भीतर न आने दे। उसी समय भगवान शिव वहाँ आए, किन्तु बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर क्रुद्ध होकर शिवगणों और स्वयं शिवजी से युद्ध हुआ और शिवजी ने त्रिशूल से बालक का मस्तक काट दिया।
जब माता पार्वती को यह ज्ञात हुआ तो वे शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठीं और प्रलय करने पर उतारू हो गईं। समस्त देवता भयभीत हो गए। तब शिवजी ने माता को शान्त करने के लिए वचन दिया कि बालक पुनः जीवित होगा। उन्होंने अपने गणों को आज्ञा दी कि उत्तर दिशा में जो सबसे पहला प्राणी मिले, उसका मस्तक ले आएँ। गणों को एक गजशिशु मिला, और शिवजी ने उसका मस्तक बालक के धड़ पर स्थापित कर उसे पुनर्जीवित कर दिया।
इस प्रकार गजमुख वाले उस बालक का नाम "गणेश" पड़ा। भगवान शिव ने उन्हें समस्त गणों का अधिपति बनाया और वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ अथवा पूजा से पूर्व सर्वप्रथम गणेश का ही पूजन होगा। जो ऐसा नहीं करेगा, उसका कार्य विघ्नों से बाधित होगा। तभी से "प्रथम पूज्य" श्रीगणेश की आराधना हर मंगल कार्य का आरम्भ बनी।
गणेश चतुर्थी के दिन भक्त शुभ मुहूर्त में गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं, प्राणप्रतिष्ठा करते हैं और दूर्वा, लाल पुष्प, मोदक तथा लड्डू का भोग अर्पित करते हैं। इस दिन चन्द्रदर्शन वर्जित माना जाता है, क्योंकि पौराणिक कथानुसार चन्द्रमा ने गणेशजी का उपहास किया था, जिससे उन्हें शाप मिला था — इसीलिए इस दिन चन्द्रमा को देखने से मिथ्या कलंक लगता है।
महाराष्ट्र में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने इस पर्व को सार्वजनिक रूप देकर जनजागरण और एकता का माध्यम बनाया, और तभी से गणेशोत्सव एक विशाल सामाजिक उत्सव बन गया। दस दिनों तक भजन, आरती, प्रसाद-वितरण और सेवा-भाव से वातावरण भक्तिमय हो उठता है, और अनन्त चतुर्दशी के दिन धूमधाम से गणपति का विसर्जन किया जाता है।
"गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया" के जयघोष से गूँजता यह पर्व भक्तों के हृदय में असीम आनन्द भर देता है। गणेश चतुर्थी की महिमा यही है — जहाँ भक्ति और श्रद्धा से गणपति विराजते हैं, वहाँ विघ्न मिटते हैं, बुद्धि प्रकाशित होती है और सुख-समृद्धि का वास होता है।