
गणपति विसर्जन की परंपरा की कथा
Ganpati Visarjan Ki Parampara Ki Katha
गणेशोत्सव का समापन "गणपति विसर्जन" की भावपूर्ण परम्परा से होता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को स्थापित हुई गणपति की प्रतिमा को दस दिनों की पूजा-अर्चना के पश्चात अनन्त चतुर्दशी के दिन जल में विसर्जित किया जाता है। यह क्षण भक्तों के लिए अत्यन्त भावुक होता है — आँखों में आँसू और होठों पर "गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ" का जयघोष एक साथ गूँजता है।
विसर्जन की इस परम्परा के पीछे एक गूढ़ आध्यात्मिक कथा और भाव छिपा है। मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने जब महाभारत की रचना का संकल्प लिया, तब उन्होंने श्रीगणेश से लेखक बनने की प्रार्थना की। गणपति ने यह शर्त रखी कि लेखनी एक क्षण के लिए भी न रुके, और व्यास जी ने शर्त रखी कि गणेश बिना अर्थ समझे कुछ न लिखें। इस प्रकार लगातार दस दिनों तक व्यास जी कथा कहते रहे और गणपति उसे लिखते रहे।
कहा जाता है कि यह लेखन कार्य भाद्रपद चतुर्थी से आरम्भ हुआ था और निरन्तर परिश्रम के कारण दस दिनों में गणपति के शरीर का ताप बहुत बढ़ गया। तब व्यास जी ने चतुर्दशी के दिन गणपति के शरीर पर शीतल जल और मिट्टी का लेप लगाकर उन्हें जल में शीतल किया। इसी स्मृति में गणपति की मिट्टी की प्रतिमा को दस दिनों की सेवा के बाद जल में विसर्जित करने की परम्परा चली।
विसर्जन का एक गहरा दार्शनिक अर्थ भी है। यह हमें सिखाता है कि यह संसार और यह देह नश्वर है। जिस प्रकार मिट्टी से बनी प्रतिमा अन्ततः जल में विलीन होकर पुनः प्रकृति में मिल जाती है, उसी प्रकार जीव भी अन्ततः परमात्मा में विलीन हो जाता है। "आगमन" और "विसर्जन" जीवन के आने-जाने के शाश्वत सत्य का प्रतीक हैं — यह पर्व मोह-त्याग और वैराग्य का भी संदेश देता है।
विसर्जन के दिन भक्त प्रातःकाल गणपति की विशेष पूजा, आरती और महाभोग अर्पित करते हैं। उनसे वर्षभर की समृद्धि और अगले वर्ष पुनः पधारने की प्रार्थना की जाती है। फिर ढोल-नगाड़ों, भजन और नृत्य के साथ शोभायात्रा निकलती है और अत्यन्त उल्लास तथा श्रद्धा के साथ प्रतिमा को नदी, तालाब अथवा समुद्र में प्रवाहित किया जाता है।
आज के समय में पर्यावरण के प्रति जागरूकता के कारण अनेक भक्त मिट्टी की प्राकृतिक प्रतिमाओं का उपयोग करते हैं और घर पर ही एक पात्र में जल में विसर्जन करते हैं, जिससे जलस्रोत स्वच्छ रहें। यह भाव भी गणपति की उसी शिक्षा के अनुरूप है, जिसमें प्रकृति और मर्यादा का सम्मान निहित है।
गणपति विसर्जन की परम्परा की महिमा यही है — जो भक्त श्रद्धा से बप्पा का स्वागत करता है और भावपूर्वक उन्हें विदा करता है, उसके हृदय में गणपति सदा विराजते हैं। बप्पा भले जल में विलीन हो जाएँ, किन्तु उनकी कृपा और आशीर्वाद भक्त के जीवन में स्थायी रूप से बस जाते हैं।