
विघ्नराज की कथा — 'विघ्नहर्ता' नाम की उत्पत्ति
Vighnaraj Ki Katha
सृष्टि के आरंभिक काल में एक ऐसी अवस्था थी जब देवता, ऋषि-मुनि और मनुष्य कोई भी शुभ कार्य, यज्ञ या अनुष्ठान करते तो वह बिना किसी बाधा के सहज ही पूर्ण हो जाता था। किन्तु इसका परिणाम यह हुआ कि लोग बिना परिश्रम, बिना संयम और बिना पवित्रता के भी सिद्धि पा लेते थे। सत्कर्म और दुष्कर्म का भेद मिटने लगा और धर्म की मर्यादा शिथिल पड़ने लगी।
इस अव्यवस्था से चिंतित होकर देवता और ऋषिगण भगवान शिव के पास पहुँचे और प्रार्थना की — "हे प्रभु! ऐसी कोई व्यवस्था कीजिए जिससे केवल पवित्र मन, शुद्ध आचरण और सच्ची श्रद्धा से किया गया कार्य ही निर्विघ्न पूर्ण हो, और अपात्र तथा दुष्ट व्यक्तियों के कार्यों में बाधा उत्पन्न हो, जिससे धर्म की मर्यादा बनी रहे।"
समस्त प्राणियों की इस पुकार को सुनकर परम शक्ति ने एक ऐसे दिव्य स्वरूप को प्रकट किया, जो समस्त विघ्नों और बाधाओं का स्वामी हो। इस स्वरूप को 'विघ्नराज' अथवा 'विघ्नेश्वर' कहा गया — अर्थात विघ्नों के अधिपति। उन्हें यह अधिकार प्राप्त हुआ कि वे किसके कार्य में विघ्न डालें और किसके कार्य से विघ्न हटाएँ, इसका निर्णय वे ही करेंगे।
अब जब कोई शुभ कार्य आरंभ होता, तो सबसे पहले विघ्नराज गणेश की पूजा करनी अनिवार्य हो गई। जो व्यक्ति श्रद्धा, पवित्रता और सच्चे भाव से सर्वप्रथम गणेश जी का स्मरण और पूजन करता, उसके कार्य से गणेश जी समस्त विघ्न हर लेते और कार्य सहज ही निर्विघ्न सम्पन्न हो जाता। किन्तु जो अहंकारी, अपवित्र अथवा दुष्ट होकर बिना गणेश-वंदना के कार्य आरंभ करता, उसके मार्ग में अनेक बाधाएँ खड़ी हो जातीं।
इस प्रकार विघ्नराज गणेश का यह दोहरा स्वरूप प्रकट हुआ — वे 'विघ्नकर्ता' भी हैं और 'विघ्नहर्ता' भी। अपात्रों और अहंकारियों के लिए वे विघ्न उत्पन्न करने वाले हैं, तो अपने सच्चे भक्तों और सत्कर्म करने वालों के लिए वे समस्त बाधाओं को हरने वाले परम कल्याणकारी देव हैं। इसी गुण के कारण उनका एक प्रसिद्ध नाम 'विघ्नहर्ता' पड़ा।
देवताओं ने भी अनुभव किया कि अब सृष्टि में एक संतुलन स्थापित हो गया है। धर्म, संयम और श्रद्धा से किया गया कार्य ही फलदायी होने लगा और अधर्म तथा अहंकार से किए गए प्रयास स्वतः बाधित होने लगे। इससे प्रसन्न होकर समस्त देवताओं ने गणेश जी को प्रथम पूज्य होने का गौरव प्रदान किया और घोषणा की कि किसी भी कार्य, यज्ञ या मंगल-अनुष्ठान के आरंभ में सर्वप्रथम विघ्नहर्ता गणेश की ही वंदना होगी।
तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि विवाह, गृह-प्रवेश, यज्ञ, पूजा अथवा किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में सबसे पहले "श्री गणेशाय नमः" कहकर विघ्नहर्ता गणेश का पूजन किया जाता है। इस कथा की महिमा यही है कि जो सच्ची श्रद्धा से गणेश जी को स्मरण करता है, उसके जीवन के समस्त विघ्न स्वयं विघ्नहर्ता हर लेते हैं और उसका प्रत्येक कार्य मंगलमय हो जाता है।