
चंद्रमा को श्राप — भाद्रपद चतुर्थी का चंद्र-दर्शन निषेध
Chandrama Ko Shrap
एक बार भगवान गणेश किसी भक्त के यहाँ निमंत्रण पर पधारे। वहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ और उन्हें उनका प्रिय भोजन — मोदक और अनेक प्रकार के लड्डू — बड़े प्रेम से परोसे गए। गणेश जी को मिष्ठान्न अत्यंत प्रिय थे, अतः उन्होंने प्रसन्न होकर पेट भरकर मोदक और लड्डू ग्रहण किए। भोजन के पश्चात उनका उदर भारी हो गया और वे अपने वाहन मूषक पर सवार होकर रात्रि में कैलास की ओर लौट चले।
मार्ग में चलते हुए अचानक एक साँप रास्ते में आ गया। उसे देखते ही नन्हा मूषक भयभीत होकर उछल पड़ा, जिससे गणेश जी अपने वाहन से भूमि पर गिर पड़े। गिरने से उनका भारी उदर फट-सा गया और भीतर से खाए हुए सारे मोदक बाहर बिखर गए। गणेश जी ने तुरंत उस साँप को पकड़कर अपने पेट के चारों ओर कसकर बाँध लिया और सारे मोदक पुनः भीतर भरकर स्वयं को सँभाल लिया।
यह सारा दृश्य आकाश में विराजमान चंद्रमा देख रहे थे। गणेश जी की यह दशा देखकर चंद्रदेव को अपने रूप और सौंदर्य पर अभिमान हो आया और वे गणेश जी का उपहास करते हुए खिलखिलाकर हँस पड़े। चंद्रमा की यह अशिष्टता और अहंकार देखकर गणेश जी को क्रोध आ गया।
क्रोधित होकर गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दिया — "हे चंद्र! तुझे अपने सौंदर्य का इतना अभिमान है कि तूने एक देव का उपहास किया। जा, आज से तेरा मुख किसी को दिखाई न देगा, और जो भी तुझे देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा।" श्राप सुनते ही चंद्रमा का प्रकाश लुप्त हो गया और वे अंधकार में डूब गए।
अपने अभिमान के परिणाम को समझकर चंद्रदेव अत्यंत लज्जित और भयभीत हुए। उन्होंने गणेश जी के चरणों में गिरकर क्षमा-याचना की और बार-बार अपने अपराध के लिए पश्चाताप किया। समस्त देवताओं ने भी गणेश जी से प्रार्थना की कि चंद्रमा के बिना सृष्टि की व्यवस्था बिगड़ जाएगी।
गणेश जी करुणानिधान थे। भक्तों की प्रार्थना और चंद्रमा के पश्चाताप को देखकर उनका हृदय पिघल गया। उन्होंने श्राप को पूर्णतः वापस तो नहीं लिया, किन्तु उसका प्रभाव सीमित कर दिया और कहा — "मेरे जन्म-दिवस भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को जो व्यक्ति चंद्रमा को देखेगा, उस पर ही मिथ्या कलंक लगेगा; शेष दिनों में तेरा दर्शन शुभ रहेगा।"
इसी कारण से आज भी परंपरा है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, अर्थात गणेश चतुर्थी की रात्रि को चंद्रमा का दर्शन वर्जित माना जाता है। इस कथा की महिमा यही है कि अहंकार और उपहास सदैव पतन का कारण बनते हैं, जबकि सच्चा पश्चाताप और शरणागति करुणामय भगवान से क्षमा दिला देती है।