
महाभारत लेखन — व्यास जी के लिपिकार गणेश
Mahabharat Lekhan
जब समय आया कि इस पृथ्वी पर एक ऐसा महान ग्रंथ रचा जाए जिसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का समस्त सार समाया हो, तब महर्षि वेदव्यास के हृदय में महाभारत की रचना का संकल्प जागा। यह कथा इतनी विशाल और गूढ़ थी कि उसमें एक लाख श्लोक होने वाले थे। व्यास जी चिंतित हुए कि इतने विशाल ग्रंथ को उनके बोलने की गति के साथ-साथ कौन बिना रुके लिख सकेगा।
अपनी इस चिंता के समाधान के लिए व्यास जी ने सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी का स्मरण किया। ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने परामर्श दिया — "हे मुनिवर! इस अद्भुत ग्रंथ का लेखन केवल बुद्धि के स्वामी, विघ्नहर्ता भगवान गणेश ही कर सकते हैं। आप उनका स्मरण करें, वही आपके योग्य लिपिकार होंगे।" यह सुनकर व्यास जी ने एकाग्र मन से गणेश जी का ध्यान किया।
व्यास जी के आवाहन पर भगवान गणेश तत्काल प्रकट हो गए। व्यास जी ने उन्हें प्रणाम करके प्रार्थना की — "हे गणनायक! मैं महाभारत नामक महान ग्रंथ की रचना करना चाहता हूँ। आप ही इसके लिपिकार बनकर मेरे बोले हुए श्लोकों को लिखने की कृपा करें।" गणेश जी ने सहर्ष इस दायित्व को स्वीकार कर लिया।
किन्तु गणेश जी ने एक शर्त रख दी — "मैं तभी लिखूँगा जब मेरी लेखनी एक क्षण के लिए भी न रुके। यदि आप बोलते-बोलते रुक गए और मेरी कलम को ठहरना पड़ा, तो मैं लिखना छोड़ दूँगा।" यह शर्त सुनकर व्यास जी सोच में पड़ गए, क्योंकि निरंतर बिना विचारे बोलते रहना असंभव था।
तब बुद्धिमान व्यास जी ने भी विनम्रता से एक प्रति-शर्त रखी — "हे प्रभु, मैं स्वीकार करता हूँ; किन्तु आप भी बिना समझे किसी श्लोक को न लिखें। जिस श्लोक का अर्थ आप पूर्ण रूप से समझ लें, उसी को लिखें।" गणेश जी ने मुस्कुराकर यह शर्त मान ली, और इस प्रकार दोनों के बीच एक अनूठा समझौता हो गया।
अब व्यास जी की बुद्धिमत्ता का रहस्य प्रकट हुआ। वे बीच-बीच में जान-बूझकर ऐसे कूट और गूढ़ श्लोक बोल देते, जिनका अर्थ समझने में गणेश जी को कुछ क्षण लग जाते। जितनी देर गणेश जी उन कठिन श्लोकों का अर्थ मनन करते, उतनी देर में व्यास जी आगे के अनेक सरल श्लोकों की रचना अपने मन में कर लेते। इस युक्ति से लेखन कभी रुका नहीं और व्यास जी को विचार का अवसर भी मिलता रहा।
कहा जाता है कि लिखते-लिखते एक बार गणेश जी की लेखनी टूट गई, तब भी शर्त न टूटे इसलिए उन्होंने अपना एक दाँत तोड़कर उसी से लेखन जारी रखा — इसी कारण वे 'एकदंत' कहलाए। इस प्रकार गुरु-शिष्य के सामंजस्य से महाभारत जैसा अमर ग्रंथ पूर्ण हुआ। इस कथा की महिमा यही है कि जहाँ ज्ञान और बुद्धि मिलकर श्रद्धा से कार्य करते हैं, वहाँ असंभव भी संभव हो जाता है।