
दूर्वा चढ़ाने की कथा — अनलासुर और पेट की जलन
Durva Chadhane Ki Katha
प्राचीन काल में अनलासुर नामक एक भयंकर दैत्य ने समस्त तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उसके शरीर से इतनी प्रचंड अग्नि निकलती थी कि जहाँ वह जाता, वहाँ की धरती झुलस जाती, वन जल जाते और नदियाँ सूख जातीं। देवता, ऋषि-मुनि और समस्त प्राणी उसके ताप से त्राहि-त्राहि करने लगे। वह असुर आँखों और मुख से ज्वाला उगलता हुआ जिसे भी सामने पाता, उसे भस्म कर देता था।
इस भीषण संकट से त्रस्त होकर समस्त देवता और ऋषिगण भगवान शिव और इंद्र के पास पहुँचे और रक्षा की प्रार्थना करने लगे। सबने विचार किया कि इस अग्नि-रूप असुर का संहार केवल विघ्नहर्ता भगवान गणेश ही कर सकते हैं। तब सबने एक स्वर में गणेश जी की स्तुति करके उनसे प्रार्थना की — "हे गजानन! इस अनलासुर के अत्याचार से त्रिलोक को बचाइए।"
भक्तों की पुकार सुनकर भगवान गणेश उस असुर के संहार के लिए प्रकट हुए। जब गणेश जी और अनलासुर के बीच युद्ध हुआ, तो असुर अपनी अग्नि से बचने का प्रयास करने लगा। तब गणेश जी ने अपना विशाल रूप धारण किया और उस अग्नि उगलते दैत्य को पूरा का पूरा निगल लिया। इस प्रकार अनलासुर का अंत हो गया और तीनों लोक उसके आतंक से मुक्त हो गए।
किन्तु असुर को निगल लेने के कारण उसकी प्रचंड अग्नि अब गणेश जी के उदर में समा गई। उस भयंकर ताप से गणेश जी का पेट अत्यधिक जलने लगा और उन्हें असहनीय दाह का अनुभव होने लगा। उनकी यह पीड़ा दूर करने के लिए देवताओं ने अनेक उपाय किए। चंद्रमा उनके मस्तक पर जा बैठे, भगवान विष्णु ने कमल दिया, अनेक शीतल वस्तुएँ अर्पित की गईं, परन्तु उदर की जलन शांत न हुई।
तब कश्यप ऋषि सहित कुछ ऋषि-मुनि ताजी, कोमल दूर्वा (हरी घास) की इक्कीस गाँठें लेकर आए और उन्हें गणेश जी के मस्तक पर तथा शरीर पर अर्पित किया। आश्चर्य! उस शीतल दूर्वा के स्पर्श से गणेश जी के उदर की जलन तत्काल शांत हो गई और उन्हें परम शीतलता तथा शांति का अनुभव हुआ।
गणेश जी दूर्वा के इस गुण से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान दिया — "जो भी भक्त मुझे श्रद्धापूर्वक दूर्वा अर्पित करेगा, वह मुझे अत्यंत प्रिय होगा और उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी। जो इक्कीस दूर्वा-दल की गाँठें मुझे चढ़ाएगा, उसे सहस्रों गुना पुण्य प्राप्त होगा।"
इसी कारण आज भी भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्त्व है और इक्कीस दूर्वा-दल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस कथा की महिमा यही है कि विघ्नहर्ता गणेश भक्तों के कष्ट स्वयं वहन कर लेते हैं, और एक तिनके जैसी छोटी वस्तु भी यदि श्रद्धा से अर्पित की जाए तो वह भगवान को प्रिय हो जाती है।