
अमृत फल की परिक्रमा — बुद्धि से जीता संसार
Amrit Phal Ki Parikrama
कैलास पर्वत पर एक दिन देवर्षि नारद एक अद्भुत फल लेकर भगवान शिव और माता पार्वती के समक्ष उपस्थित हुए। वह फल कोई साधारण फल नहीं था; उसमें अमृत का सार और समस्त ज्ञान का तेज समाया हुआ था। नारद जी ने कहा कि जो भी इस फल को ग्रहण करेगा, वह सर्वज्ञ, अमर और परम बुद्धिमान हो जाएगा। यह कहकर वे फल शिव-पार्वती को सौंपकर चले गए।
अब समस्या यह थी कि वह फल एक ही था और उनके दो पुत्र थे — बड़े कार्तिकेय और छोटे गणेश। दोनों को समान प्रिय माता-पिता उस फल को किसी एक को ही दे सकते थे। तब भगवान शिव ने एक युक्ति निकाली और घोषणा की — "तुम दोनों में से जो भी सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले यहाँ लौट आएगा, यह अमृत फल उसी को मिलेगा।"
यह सुनते ही तेजस्वी कार्तिकेय बिना क्षण गँवाए अपने वाहन मयूर पर सवार हुए और वायु के वेग से सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े। नदी, पर्वत, सागर और समस्त तीर्थ पार करते हुए वे आगे बढ़ते चले गए, इस विश्वास के साथ कि उनके भारी-भरकम भाई गणेश उनसे कभी आगे नहीं निकल सकते।
उधर गणेश जी अपने छोटे मूषक वाहन के साथ खड़े विचार करने लगे। वे जानते थे कि इस विशाल पृथ्वी की परिक्रमा में वे कार्तिकेय की गति का मुकाबला नहीं कर सकते। किन्तु गणेश जी तो बुद्धि के स्वामी थे। कुछ क्षण सोचने के बाद उनके मुख पर मुस्कान आ गई और उन्होंने एक अद्भुत निर्णय लिया।
गणेश जी ने अपने माता-पिता — शिव और पार्वती — को एक स्थान पर आसन पर बिठाया, हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और उनकी सात बार परिक्रमा करने लगे। परिक्रमा पूरी करके उन्होंने विनम्रता से कहा — "हे पिता, हे माता! समस्त संसार का सार, समस्त तीर्थ और समस्त लोक तो मेरे माता-पिता के चरणों में ही निहित हैं। जिसने माता-पिता की परिक्रमा कर ली, उसने सम्पूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा कर ली।"
गणेश जी के इस वचन और भाव को सुनकर शिव-पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अनुभव किया कि गणेश ने केवल बुद्धि से ही नहीं, अपितु सच्ची भक्ति और श्रद्धा से भी यह प्रतिस्पर्धा जीत ली है। तत्काल उन्होंने वह अमृत फल गणेश जी को प्रदान कर दिया। जब कार्तिकेय थके-हारे लौटे, तब उन्हें सारी बात ज्ञात हुई और उन्होंने भी अपने छोटे भाई की बुद्धिमत्ता को हृदय से स्वीकार किया।
इस कथा की महिमा यही है कि माता-पिता की सेवा और उनके प्रति श्रद्धा समस्त तीर्थयात्राओं और संसार-भ्रमण से भी बड़ी है — और सच्ची बुद्धि वही है जो भक्ति से जुड़ी हो।