
रावण और आत्मलिंग — बालक गणेश की चतुराई
Ravan Aur Atmalinga
लंकापति रावण भगवान शिव का परम भक्त था। उसकी इच्छा थी कि शिव जी की अपार शक्ति सदा उसके पास रहे, जिससे वह अजेय बन जाए। इसी कामना से उसने कैलास पर जाकर घोर तपस्या आरंभ की। वर्षों तक कठोर साधना, अपने मस्तक की बलि तक चढ़ाने को तत्पर उसकी अटूट भक्ति देखकर अंततः भगवान शिव प्रसन्न हुए और उसके समक्ष प्रकट हो गए।
शिव जी ने रावण से वर माँगने को कहा। तब रावण ने अपना 'आत्मलिंग' माँगा — वह दिव्य शिवलिंग जिसमें स्वयं शिव की सम्पूर्ण शक्ति समाई थी। शिव जी ने वह आत्मलिंग उसे प्रदान तो कर दिया, किन्तु एक कठोर शर्त रख दी — "इस आत्मलिंग को मार्ग में कहीं भी भूमि पर मत रखना। जहाँ तुम इसे एक बार भूमि पर रख दोगे, यह वहीं सदा के लिए स्थापित हो जाएगा और फिर हटाया न जा सकेगा।" रावण ने शर्त स्वीकार कर आत्मलिंग लेकर लंका की ओर प्रस्थान किया।
समस्त देवता चिंतित हो उठे। यदि यह शक्तिशाली आत्मलिंग रावण के पास पहुँच गया, तो वह और भी अधिक अत्याचारी और अजेय हो जाएगा। तब देवताओं ने भगवान विष्णु और गणेश जी की शरण ली और प्रार्थना की कि किसी युक्ति से आत्मलिंग को लंका पहुँचने से रोका जाए। भगवान विष्णु ने अपनी माया से सूर्य को ढक दिया, जिससे संध्या-सा अंधकार छा गया।
रावण को लगा कि सायंकाल हो चला है और संध्यावंदन का समय आ गया है, जिसे वह कभी नहीं छोड़ता था। किन्तु आत्मलिंग को भूमि पर रखा नहीं जा सकता था और वह उसे थामे-थामे संध्या कैसे करे — इसी दुविधा में वह पड़ गया। तभी वहाँ एक ब्राह्मण बालक प्रकट हुआ। वह बालक और कोई नहीं, स्वयं भगवान गणेश थे।
रावण ने उस बालक से प्रार्थना की — "हे बालक! तुम इस आत्मलिंग को कुछ क्षण अपने हाथ में थामे रहो, जब तक मैं संध्यावंदन पूरा कर लूँ। किन्तु ध्यान रहे, इसे भूमि पर मत रखना।" बालक-रूपी गणेश ने चतुराई से एक शर्त रखी — "मैं इसे तब तक थामे रहूँगा, किन्तु जब यह भारी हो जाएगा तो मैं तीन बार तुम्हें पुकारूँगा; यदि तुम तब भी न आए, तो मैं इसे भूमि पर रख दूँगा।" रावण ने विवश होकर यह शर्त मान ली।
रावण संध्यावंदन में लीन हुआ ही था कि बालक ने उसे पुकारना आरंभ किया। तीव्रता से तीन बार पुकार लगाकर, इससे पूर्व कि रावण अपनी पूजा पूरी कर पाता, गणेश जी ने वह आत्मलिंग भूमि पर रख दिया। शर्त के अनुसार आत्मलिंग वहीं स्थिर हो गया। रावण दौड़ा आया और अपने पूरे बल से उसे उखाड़ने का प्रयास करने लगा, किन्तु वह टस से मस न हुआ।
रावण के भरपूर बल लगाने से आत्मलिंग का आकार कुछ बिगड़ गया, इसी कारण वह स्थान 'गोकर्ण महाबलेश्वर' कहलाया, जहाँ आज भी वह पवित्र ज्योतिर्लिंग विराजमान है। इस कथा की महिमा यही है कि विघ्नहर्ता गणेश अपनी बुद्धि और चतुराई से देवताओं और धर्म की रक्षा करते हैं, और अहंकार से माँगी गई शक्ति अंततः हाथ नहीं लगती।