Modak Priya Hone Ki Katha

मोदक प्रिय होने की कथा

Modak Priya Hone Ki Katha

भगवान गणेश को 'मोदकप्रिय' कहा जाता है, अर्थात जिन्हें मोदक अत्यंत प्रिय है। उनके हाथ में सदैव मोदकों से भरा एक पात्र सुशोभित रहता है और उनकी हर पूजा में मोदक का भोग अनिवार्य माना जाता है। इस मोदक-प्रीति के पीछे एक अत्यंत मधुर कथा प्रचलित है, जो हमें बताती है कि यह मिष्ठान्न गणेश जी को इतना प्रिय क्यों हुआ।

एक बार देवताओं की सभा में देवमाता के पास एक अद्भुत, दिव्य मोदक आया। वह कोई साधारण मोदक नहीं था; उसमें समस्त वेदों, शास्त्रों, कलाओं और अमरता का सार समाया हुआ था। कहा गया कि जो भी इस दिव्य मोदक को ग्रहण करेगा, वह समस्त विद्याओं और शास्त्रों में पारंगत, ज्ञानवान और अमर हो जाएगा। यह सुनकर सभी देवता और वहाँ उपस्थित दोनों बालक — कार्तिकेय और गणेश — उस मोदक को पाने के इच्छुक हो उठे।

अब समस्या यह थी कि वह मोदक एक ही था। तब माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों के बीच एक निर्णय लिया। उन्होंने कहा — "यह दिव्य मोदक उसी को मिलेगा जो सदाचार, ज्ञान और श्रेष्ठ आचरण में सबसे आगे होगा तथा जो अपने माता-पिता के प्रति सर्वाधिक श्रद्धावान और आज्ञाकारी होगा।"

तेजस्वी कार्तिकेय अपने पराक्रम और वीरता पर विश्वास रखते थे, जबकि गणेश जी अपनी बुद्धि, विनम्रता और माता-पिता के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा पर स्थिर थे। जब परीक्षा की घड़ी आई, तो गणेश जी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा करके और उनकी सेवा-भक्ति का भाव प्रकट करके यह सिद्ध कर दिया कि उनके लिए माता-पिता ही सम्पूर्ण संसार हैं।

गणेश जी की इस श्रद्धा, बुद्धि और विनम्रता से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने वह दिव्य मोदक गणेश जी को प्रदान कर दिया। उस मोदक को ग्रहण करते ही गणेश जी समस्त विद्याओं, वेदों और शास्त्रों के परम ज्ञाता बन गए और उन्हें बुद्धि तथा ज्ञान के अधिपति का स्थान प्राप्त हुआ। तभी से गणेश जी सर्वप्रथम पूजनीय और बुद्धि के देवता माने जाने लगे।

इस दिव्य मोदक की प्राप्ति के कारण मोदक गणेश जी को अत्यंत प्रिय हो गया। मोदक का बाहरी आवरण मीठा और भीतर का भाग गूढ़ रस से भरा होता है — यह इस बात का प्रतीक माना जाता है कि ज्ञान का स्वाद भीतर छिपा रहता है और साधना से ही उसका आनंद प्राप्त होता है। इसीलिए मोदक को ज्ञान और आनंद का प्रतीक कहा गया।

तभी से हर भक्त गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धापूर्वक मोदक का भोग लगाता है, विशेषकर गणेश चतुर्थी के अवसर पर घर-घर में मोदक बनाए और अर्पित किए जाते हैं। इस कथा की महिमा यही है कि जहाँ बुद्धि, विनम्रता और माता-पिता के प्रति श्रद्धा हो, वहीं ज्ञान का दिव्य रस — मोदक — स्वयं चला आता है।

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