
कुबेर का अभिमान भंग — भोजन का निमंत्रण
Kuber Ka Abhiman Bhang
देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर तीनों लोकों में अपने अपार धन-वैभव के लिए प्रसिद्ध थे। उनका नगर अलकापुरी स्वर्ण, रत्नों और ऐश्वर्य से भरा हुआ था। किन्तु इस असीम सम्पत्ति के साथ-साथ कुबेर के मन में अपने धन और वैभव का घमंड भी बढ़ता चला गया। वे यह दिखाना चाहते थे कि उनके समान धनी और उदार कोई नहीं है।
अपने वैभव का प्रदर्शन करने की इच्छा से कुबेर एक दिन कैलास पर भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुँचे और उन्हें बड़े गर्व के साथ अपने यहाँ भव्य भोजन का निमंत्रण दिया। शिव जी कुबेर के मन का अभिमान भाँप गए। उन्होंने विनम्रता से कहा — "हे कुबेर! हम तो तपस्वी हैं, किन्तु हमारा पुत्र गणेश अभी बालक है। तुम इसे ही अपने यहाँ भोजन पर ले जाओ।" कुबेर प्रसन्न हो गए कि एक नन्हे बालक को भला कितना भोजन चाहिए होगा।
कुबेर गणेश जी को अपनी अलकापुरी ले आए। वहाँ भाँति-भाँति के व्यंजन, मिष्ठान्न और छप्पन प्रकार के भोग सजाए गए। भोजन आरंभ हुआ और नन्हे गणेश खाने लगे। किन्तु आश्चर्य! वे जितना खाते, उनकी भूख उतनी ही बढ़ती जाती। थोड़ी ही देर में उन्होंने परोसे गए सारे व्यंजन समाप्त कर दिए।
कुबेर घबरा गए और उन्होंने रसोइयों को और भोजन बनाने का आदेश दिया। रसोइयों ने दिन-रात भोजन पकाया, भंडार के सारे अन्न, फल, मिष्ठान्न और व्यंजन गणेश जी के समक्ष रखे जाते रहे, पर गणेश जी की भूख शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी। वे सब कुछ खाते चले गए और फिर भी "और लाओ, मुझे भूख लगी है" कहते रहे।
अंततः अलकापुरी का समस्त भंडार रिक्त हो गया। जब खाने को कुछ शेष न बचा, तो गणेश जी ने कहा — "हे कुबेर! तुमने तो मुझे भूखा ही रखा; अब मैं तुम्हारा नगर और तुम्हें ही निगल जाऊँगा।" यह सुनकर घमंडी कुबेर की सारी अकड़ जाती रही। भयभीत और लज्जित होकर वे दौड़ते हुए कैलास पहुँचे और शिव जी के चरणों में गिर पड़े।
कुबेर ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की — "हे प्रभु! मुझसे भूल हुई, मेरा सारा अभिमान चूर हो गया है। कृपया मुझे इस संकट से उबारिए।" तब शिव जी ने मुस्कुराकर कुबेर को एक मुट्ठी भुने हुए चावल दिए और कहा — "इसे प्रेम और विनम्रता से गणेश को अर्पित कर देना; इससे इसकी भूख शांत हो जाएगी।" कुबेर ने वैसा ही किया।
आश्चर्य की बात यह हुई कि छप्पन भोग जो गणेश जी की भूख शांत न कर सके थे, वही कार्य श्रद्धा और विनम्रता से अर्पित एक मुट्ठी चावल ने कर दिया। गणेश जी तृप्त हो गए और उनका उदर शांत हो गया। इस कथा की महिमा यही है कि भगवान धन और वैभव के प्रदर्शन से नहीं, अपितु प्रेम, विनम्रता और श्रद्धा से ही तृप्त होते हैं — और अभिमान का अंत निश्चित है।