Gokul se Vrindavan Prasthaan

गोकुल से वृंदावन प्रस्थान

Gokul se Vrindavan Prasthaan

पूतना, शकटासुर, तृणावर्त और यमलार्जुन उद्धार जैसी अनेक अद्भुत घटनाएँ गोकुल में एक के बाद एक घटित होती रहीं। इन घटनाओं को देखकर गोकुल के वयोवृद्ध गोपजन चिंतित हो उठे। नंदबाबा के मुखिया-प्रमुख और गोकुल के बुज़ुर्ग उपनंद ने एक सभा बुलाई और सबको संबोधित करते हुए कहा — "अब गोकुल में निरंतर उपद्रव और अनहोनी घटनाएँ हो रही हैं। हमारे बालकों, विशेषकर नंद के लाल के लिए यह स्थान अब सुरक्षित नहीं रहा। हमें अपने गोकुल को छोड़कर किसी अन्य सुरक्षित एवं सुंदर स्थान पर चलना चाहिए।"

उपनंद ने आगे कहा — "यहाँ से कुछ ही दूरी पर वृंदावन नामक एक अत्यंत रमणीय वन है। वहाँ हरे-भरे चरागाह हैं, यमुना का निर्मल जल है, गोवर्धन पर्वत है और गौओं के लिए स्वादिष्ट घास से भरे विशाल मैदान हैं। वह स्थान गौ-पालन के लिए सर्वथा उपयुक्त है और वहाँ हमारे बच्चे भी सुरक्षित रहेंगे।" उपनंद का यह प्रस्ताव सभी गोपजनों को उचित लगा और सबने एक स्वर में वृंदावन जाने का निश्चय किया।

निश्चय होते ही सारा गोकुल प्रस्थान की तैयारी में जुट गया। गोपजनों ने अपने-अपने छकड़े (बैलगाड़ियाँ) सजाईं और उन पर घर का सारा सामान — बर्तन, वस्त्र, अनाज, दही-दूध और गृहस्थी की वस्तुएँ लादीं। स्त्रियों ने अपने बालकों को गोद में लिया, वृद्धजन गाड़ियों पर बैठे और युवक गौ, बैल तथा बछड़ों के झुंड को हाँकते हुए आगे बढ़े। ब्राह्मणों को आगे रखा गया, वेद-मंत्रों का उच्चारण हुआ और मंगल-वाद्यों की ध्वनि के साथ यह विशाल यात्रा-दल गोकुल से चल पड़ा।

जब सारे गोप, गोपियाँ, गौएँ और छकड़े व्यवस्थित रूप से पंक्ति बनाकर चलने लगे, तो वह दृश्य अत्यंत मनोहर था। नंदबाबा और यशोदा माता एक सुसज्जित गाड़ी में बालकृष्ण और बलराम को लेकर आगे-आगे चल रहे थे। दोनों बालक इस यात्रा से अत्यंत प्रसन्न थे और नए-नए दृश्यों को कौतूहल से निहार रहे थे। धूल उड़ाती हुई गौओं की टोली, बजते हुए घुँघरू और गोपियों के मंगल-गीत — इन सबने वातावरण को उल्लास से भर दिया।

कुछ समय की यात्रा के पश्चात यह दल वृंदावन पहुँच गया। वृंदावन की शोभा देखते ही बनती थी — चारों ओर हरियाली, फूलों से लदे वृक्ष, गुनगुनाते भँवरे, कलरव करते पक्षी, यमुना का शीतल-निर्मल प्रवाह और सामने खड़ा गोवर्धन पर्वत। गोपजनों ने वहाँ अपने छकड़ों को अर्धचंद्राकार पंक्ति में खड़ा करके एक सुरक्षित बस्ती बसाई और नए घर बनाकर सुखपूर्वक रहने लगे। ऐसी सुंदर, पवित्र भूमि पाकर सभी का मन आनंद से भर गया।

वृंदावन की इस दिव्य भूमि पर ही आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण की अनेक अलौकिक लीलाएँ — गौ-चारण, वेणु-वादन, यमुना-तट की क्रीड़ाएँ और रास आदि — प्रकट होने वाली थीं। इस प्रकार गोकुल की बाल-लीलाओं का एक अध्याय पूर्ण हुआ और वृंदावन की मधुर लीलाओं का शुभारंभ होने को था।

यह प्रसंग यह भाव प्रकट करता है कि भगवान जहाँ निवास करते हैं, वह स्थान स्वयं तीर्थ बन जाता है और उनके संकल्प से ही समस्त कल्याण होता है। वृंदावन-गमन केवल एक स्थान-परिवर्तन नहीं, अपितु भक्ति और प्रेम की उस दिव्य लीला-भूमि की ओर प्रस्थान था, जहाँ प्रभु ने भक्तों को अपने अपार प्रेम-रस से सराबोर किया। जय वृंदावनबिहारी।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Putana Vadh - Vishaila Stanpaan aur Moksh

पूतना वध — विषैला स्तनपान और मोक्ष

Baal Leela (Gokul)
Shakatasur Vadh - Chhakda Ulatna

शकटासुर वध — छकड़ा उलटना

Baal Leela (Gokul)
Trinavart Vadh - Bawandar Wala Asur

तृणावर्त वध — बवंडर वाला असुर

Baal Leela (Gokul)
Mitti Khana aur Yashoda ko Mukh mein Brahmand Darshan

मिट्टी खाना और यशोदा को मुख में ब्रह्मांड दर्शन

Baal Leela (Gokul)
Makhan Chori aur 'Makhan Chor' Naam

माखन चोरी और 'माखन चोर' नाम

Baal Leela (Gokul)
Ookhal Bandhan (Damodar Leela)

ऊखल बंधन (दामोदर लीला)

Baal Leela (Gokul)