
गणेश और परशुराम — शिव-दर्शन का प्रसंग
Ganesh Aur Parashuram
भगवान विष्णु के अवतार परशुराम जी भगवान शिव के परम भक्त और शिष्य थे। शिव जी ने ही उन्हें अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और अपना दिव्य परशु (फरसा) प्रदान किया था। एक बार परशुराम जी अनेक असुरों का संहार करने के पश्चात भगवान शिव के दर्शन और उन्हें प्रणाम करने की उत्कट इच्छा से कैलास पर्वत पर पहुँचे।
उस समय भगवान शिव और माता पार्वती अपने अंतःपुर में विश्राम कर रहे थे और उनका एकांत भंग न हो, इसका ध्यान रखने का दायित्व द्वार पर उनके पुत्र भगवान गणेश निभा रहे थे। जब परशुराम जी भीतर जाने लगे, तो गणेश जी ने द्वार पर उन्हें विनम्रता से रोक दिया और कहा — "इस समय माता-पिता विश्राम में हैं, अतः अभी भीतर जाना उचित नहीं। कृपया प्रतीक्षा कीजिए।"
परशुराम जी को गणेश जी का यह रोकना अच्छा नहीं लगा। उन्हें विश्वास था कि वे शिव जी के प्रिय शिष्य हैं और उन्हें भीतर जाने से रोकना अनुचित है। किन्तु गणेश जी अपने कर्तव्य पर दृढ़ रहे और उन्होंने बार-बार समझाया कि माता-पिता के एकांत में विघ्न डालना धर्म के विरुद्ध है। इस पर दोनों के बीच वाद-विवाद बढ़ गया और अंततः बात युद्ध तक जा पहुँची।
गणेश जी ने अपनी सूँड में परशुराम जी को उठाकर घुमा दिया और अपनी शक्ति का परिचय दिया। इससे क्रोधित होकर परशुराम जी ने वही परशु उठाया जो उन्हें स्वयं भगवान शिव ने प्रदान किया था और उसे गणेश जी पर चला दिया। गणेश जी ने जान लिया कि यह परशु उनके पिता शिव का दिया हुआ दिव्य अस्त्र है।
पिता के दिए हुए अस्त्र का सम्मान रखने के लिए गणेश जी ने उस प्रहार को रोका नहीं, अपितु उसे सादर स्वीकार कर लिया। उस परशु के प्रहार से गणेश जी का एक दाँत टूट गया। इसी कारण भगवान गणेश 'एकदंत' के नाम से भी विख्यात हुए। गणेश जी ने पीड़ा सहते हुए भी पिता के अस्त्र के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान बनाए रखा।
यह सारा दृश्य जब माता पार्वती ने देखा, तो वे अपने पुत्र को घायल देखकर अत्यंत क्रोधित हो उठीं। उनका रौद्र रूप देखकर देवता तक भयभीत हो गए। तब भगवान शिव और स्वयं परशुराम जी ने माता पार्वती को शांत किया। परशुराम जी को अपने कृत्य पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने गणेश जी के इस त्याग तथा पितृ-भक्ति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
प्रसन्न होकर परशुराम जी ने गणेश जी को अपना दिव्य परशु और अनेक आशीर्वाद प्रदान किए, और यह भी वर दिया कि उनके इस त्याग के कारण वे सदा प्रथम पूज्य रहेंगे। इस कथा की महिमा यही है कि कर्तव्यपालन और माता-पिता के प्रति श्रद्धा के लिए गणेश जी ने अपनी पीड़ा तक सहर्ष स्वीकार कर ली — यही 'एकदंत' रूप उनकी त्याग-भावना और आज्ञाकारिता का प्रतीक बन गया।