Krishna

Papiya Re Piv Ki Bani Na Bol

पपइया रे! पिव की बाणि न बोल

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पपइया रे! पिव की बाणि न बोल। सुणि पावेली बिरहणी रे थारी रालेली पांख मरोड़ ॥ टेक ॥ चांच कटाऊं पपइया रे ऊपर कालोर लूण। पिव मेरा मैं पिव की रे तू पिव कहै स कूण ॥1॥ थारा सबद सुहावणा रे जो पिव मेला आज। चांच मढ़ाऊं थारी सोवनी रे तू मेरे सिरताज ॥2॥ प्रीतम कूं पतियां लिखूं रे कागा तू ले जाय। जाइ प्रीतम जासूं यूं कहै रे थारि बिरहण धान न खाय ॥3॥ 'मीरा' दासी ब्याकुली रे पिव-पिव करत बिहाय। बेगि मिलो प्रभु अंतरजामी तुम बिनु रह्यौ न जाय ॥4॥

✍️ रचयिता: मीराबाई

इस भजन के बारे में

यह भजन कृष्ण-भक्ति की अनन्य साधिका मीराबाई द्वारा रचित है। इसमें मीरा अपनी विरह-व्यथा को पपीहे के माध्यम से व्यक्त कर रही हैं। वे पपीहे से कहती हैं कि हे पपीहे! तू 'पिव-पिव' (प्रियतम) की रट मत लगा, क्योंकि तेरी यह पुकार मेरे विरह के घाव को और गहरा कर देती है। यदि तू मेरे प्रियतम से मिलवा दे, तो मैं तेरी चोंच सोने से मढ़वा दूंगी, अन्यथा तेरी यह पुकार मुझे और अधिक व्याकुल कर देती है। मीरा का भाव यह है कि जब तक प्रियतम का मिलन न हो, तब तक उनके नाम का स्मरण भी हृदय को तड़पाने वाला होता है।

यह भजन मुख्य रूप से विरह और प्रतीक्षा के भाव को समर्पित है। भक्त इसे तब गाते हैं जब वे ईश्वर की प्राप्ति के लिए व्याकुल हों और उनके वियोग में तड़प रहे हों। यह मीरा के उस अटूट प्रेम को दर्शाता है जहाँ भक्त अपने आराध्य के बिना एक पल भी नहीं रह सकता। इस भजन को गाने से मन में ईश्वर के प्रति समर्पण और उनकी प्रतीक्षा का भाव जागृत होता है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति वही है जिसमें भक्त का रोम-रोम केवल अपने प्रभु के मिलन की प्रतीक्षा में ही व्यतीत हो।

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