Krishna

Krishna Sudama Milan

कृष्ण सुदामा मिलन

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रो पड़े कृष्ण कन्हैया, गले से लगा के सुदामा को। धोए चरण आंसुओं की धार से, बिठा के सिंहासन पे सखा को ॥ टेक ॥ फटे हुए कपड़े हैं, पैरों में छाले। आए हैं द्वारिका में, विप्र दीन-हारे॥ द्वारपालों ने जाकर जब नाम था बताया। नंगे पैर दौड़े आए, मेरे कृष्ण कन्हैया॥ सुध-बुध भूल गए अपनी, देख कर मित्र की दशा को। रो पड़े कृष्ण कन्हैया, गले से लगा के सुदामा को ॥1॥ ला कर के अपने, सिंहासन पे बिठाया। रुक्मिणी ने सोने के, थाल को सजाया॥ पानी परात को हाथ छुयो नहिं। नैनन के जल सों पग धोए वहीं॥ दुनिया ने देखा उस पल, प्रभु की अजब ममता को। रो पड़े कृष्ण कन्हैया, गले से लगा के सुदामा को ॥2॥ रूखे-सूखे चावल जो, भाभी ने भेजे। छिपा रहे थे सुदामा, अपने सखा से॥ छीन लिए कान्हा ने, पोटली वो प्यारी। खाते ही दो मुट्ठी, दे दी दुनिया सारी॥ बोले कैसा ये संकोच है, खिला दे तू अपने सखा को। रो पड़े कृष्ण कन्हैया, गले से लगा के सुदामा को ॥3॥ मांगा नहीं कुछ भी, मित्र ने जुबां से। विदाई ली सुदामा ने, जब वहां से॥ लौट कर जो अपने, गाँव वो आए। झोपड़ी की जगह, महल जगमगाए॥ रंक से राजा बना दिया, जान कर मन की व्यथा को। रो पड़े कृष्ण कन्हैया, गले से लगा के सुदामा को ॥4॥ ऐसी है मेरे, कन्हैया की यारी। तीनों लोक की संपत्ति, मित्र पर वारी॥ कृष्ण-सुदामा की जो, महिमा को गाए। उसके जीवन में, कभी कष्ट ना आए॥ सच्ची मित्रता का पाठ पढ़ाया, सारे संसार को। रो पड़े कृष्ण कन्हैया, गले से लगा के सुदामा को। धोए चरण आंसुओं की धार से, बिठा के सिंहासन पे सखा को ॥5॥

इस भजन के बारे में

यह भजन भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा की अटूट मित्रता का प्रतीक है। इसका भावार्थ यह है कि सच्ची मित्रता में ऊंच-नीचाह या धन-दौलत का कोई स्थान नहीं होता। जब सुदामा अपनी निर्धनता में कृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे, तो कृष्ण ने उन्हें न केवल गले लगाया, बल्कि अपने आंसुओं से उनके चरणों को धोकर प्रेम की पराकाष्ठा दिखा दी। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ईश्वर अपने भक्त के प्रेम और समर्पण के भूखे होते हैं, न कि दिखावे के।

भक्त इस भजन को विशेष रूप से मित्रता दिवस, जन्माष्टमी या किसी भी ऐसे अवसर पर गाते हैं जब वे प्रभु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करना चाहते हैं। इसे गाने से मन में करुणा, सरलता और निस्वार्थ प्रेम का भाव जागृत होता है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि यदि हम सुदामा की तरह निष्काम भाव से प्रभु की शरण में जाएं, तो वे हमारे जीवन के सभी दुखों को दूर कर हमें सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। इसे सुनने या गाने से मन को असीम शांति मिलती है और अहंकार का नाश होता है।

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