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Maiya Mohi Dau Bahut Khijhayo

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो

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Maiya Mohi Dau Bahut Khijhayo
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मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो। मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो। कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात। पुनि पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात। गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात। चुटकी दै दै ग्वाल नचावत हंसत सबै मुसुकात। तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै। मोहन मुख रिस की ये बातैं जसुमति सुनि सुनि रीझै। सुनहु कान बलभद्र चबाई जनमत ही को धूत। सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥

इस भजन के बारे में

यह भजन भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला का एक अत्यंत मनमोहक और हृदयस्पर्शी प्रसंग है। इसमें नटखट कन्हैया अपनी मैया यशोदा से दाऊ (बलराम) की शिकायत कर रहे हैं कि दाऊ उन्हें बहुत चिढ़ाते हैं। कृष्ण मैया से कहते हैं कि दाऊ उनसे कहते हैं कि उन्हें मोल लिया गया है और यशोदा मैया ने उन्हें जन्म नहीं दिया। इस बात से कृष्ण इतने रूठ जाते हैं कि वे खेलने भी नहीं जाते। वे मैया से पूछते हैं कि जब नंद बाबा और यशोदा मैया दोनों गोरे हैं, तो वे सांवले क्यों हैं? ग्वाल-बाल भी दाऊ के कहने पर उन्हें चिढ़ाते और हँसते हैं। कृष्ण मैया से शिकायत करते हैं कि मैया केवल उन्हें ही मारना जानती हैं, दाऊ को कभी कुछ नहीं कहतीं।

यह भजन भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप की सरलता, भोलापन और मैया के प्रति उनके अनन्य प्रेम को दर्शाता है। यह सूरदास जी द्वारा रचित है और इसमें वात्सल्य रस की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। यह हमें बताता है कि कैसे भगवान भी अपने भक्तों के साथ एक साधारण बच्चे की तरह लीला करते हैं।

भक्त इस भजन को विशेष रूप से जन्माष्टमी के अवसर पर या किसी भी शुभ दिन पर गाते हैं, जब वे भगवान के बाल रूप का स्मरण करना चाहते हैं। इसे गाने से मन में शांति, आनंद और भगवान के प्रति गहरा प्रेम उत्पन्न होता है। यह भजन भक्तों को भगवान और उनके भक्तों के बीच के मधुर संबंध का अनुभव कराता है और हृदय को भक्तिमय ऊर्जा से भर देता है।

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