Karigar Mat Na Bhatke Re
कारीगर मत ना भटके रे
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दौड़ सके तो दौड़ ले, जब लग तेरी दौड़।
दौड़ थकी धोखा मिट्या, वस्तु ठौड़ की ठौड़॥ दोहा
कारीगर मत ना भटके रे, मुसाफिर तू क्यूं भटके रे।
कर मालिक ने याद काम थारो, कदे नी अटके रे ॥ टेक ॥
कारीगर पत्थर घड़े, पत्थर में पायो छेद।
छेद माँहि कीड़ो जीवतो रे, नहीं जीवण री उम्मीद।
के मुख माँहि दाणो लटके रे, कर मालिक ने याद काम थारो कदे नी अटके रे ॥1॥
कारीगर किरतार ने रे भाई करवा लागो याद।
दौड़ बुढ़ापो आवियो रे, कदे नहीं भजियो राम।
भरोसे बैठो डटके रे, कर मालिक ने याद काम थारो कदे नी अटके रे ॥2॥
जंगल में मंगल भया रे, चरू मिल्या जर्मी दोय।
भगत केवे भगवान ने रे, बांधे क्यूं नहीं पोट।
घरे म्हारे क्यूं नहीं पटके रे, कर मालिक ने याद काम थारो कदे नी अटके रे ॥3॥
चोरों ने चरचा सुणी भाई, लीना चरू निकाल।
कर्महीन धन कैसे पावे, धन का हो गया प्याल।
बात चोरों ने खटके रे, कर मालिक ने याद काम थारो कदे नी अटके रे ॥4॥
चोरों चरू निकालिया, अरे लीना ढकण लगाय।
जा पटको उण दुश्मन पर रे, काळ उसी को खाय।
दुश्मन मर जावे झटके रे, कर मालिक ने याद काम थारो कदे नी अटके रे ॥5॥
चोर चढ़्या छत ऊपरे, लीना छप्पर उगाड़।
माधो कहे धन देवे दाता, देवे छप्पर फाड़।
कारीगर गिणले झटके रे, कर मालिक ने याद काम थारो कदे नी अटके रे ॥6॥
✍️ रचयिता: माधो
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