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Jaipur Ka Govind Dev Ji

जयपुर का गोविन्द देव जी

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जयपुर का गोविन्द देव जी, राधा और रुक्मण ने ल्याजे लेर जी ॥ टेक ॥ मोरमुकुट घनश्याम सांवरा, अंग वस्त्र पीताम्बर, पांच बज्या की मंगल झांकी, होवे मंदिर अंदर, थारे पिसा हाला सेठ, आवे छ महिमा गावे जोर की ॥1॥ बांया हाथ में राधा खड़ी, दांया हाथ में रुक्मण, धूप और श्रृंगार आरती, राजभोग में मक्खन, थारे मोटी मोटी सेठण्या, दंडोत लगावे लेट जी ॥2॥ सेठा को तू सेठ सावँरा, सांवतियो घनश्याम, ग्वाल आरती संध्या आरती, आवे लोग तमाम, थारे अंग्रेज आवे छ गोरा गोरा, नाचे ठुमका देर जी ॥3॥ भूल बिसर मत जाजो कान्हा, हे द्वारकानाथ, भवानी गुर्जर गावे राधा, रुक्मण ल्याजो साथ, तू नारायण मुरली वाळो, सुन द्वारकाधीश जी, जयपुर का गोविन्द देव जी, राधा और रुक्मण ने ल्याजे लेर जी ॥4॥

✍️ रचयिता: भवानी गुर्जर

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