Nirgun / Satsang

Hari Gun Gayale Re

हरी गुण गायले रे

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यहीं चलाएँ · Play here
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हरी गुण गायले रे भाई, जब लग सुखी रे शरीर। पीछे याद न आवसी रे, थारे पींजर व्यापे पीर ॥ टेक ॥ भाग भला हरिजन मिल्या रे, पड़यो समन्दरा सीर। हंसा हो चुग लीजिए रे, नाम अमोलख हीर ॥1॥ ओसर जाय दिनों दिन बीतयो, ज्यों अंजली को नीर। बहुरी न हंसा आवसी रे, इण मानसरोवर तीर ॥2॥ जोबन थकाँ भज लीजिए रे, जेज न करीये वीर। चाल बूढापो आवसी रे, थारो मनवो धरे नहीं धीर ॥3॥ सब देवन को देव रामैयो, सब पीरन को पीर। कहत कबीर भज लीजिए रे, हरि है सुख की सीर ॥4॥

✍️ रचयिता: कबीर दास

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