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Dhani Yah Brindavan Ki Renu

धनि यह बृंदावन की रेनु

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Dhani Yah Brindavan Ki Renu
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धनि यह बृंदावन की रेनु। नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु। मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन। चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु। इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु। सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥

इस भजन के बारे में

यह सुंदर भजन महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें उन्होंने श्री वृंदावन की पावन धूलि की महिमा का गुणगान किया है। इस भजन का भाव यह है कि वृंदावन की रज साक्षात वैकुंठ से भी अधिक श्रेष्ठ है, जहाँ स्वयं नंदकिशोर अपनी गायों को चराते हुए मधुर वंशी बजाते हैं। भक्त यहाँ की धूलि को अपने मस्तक पर धारण कर परम शांति और आनंद का अनुभव करता है। यहाँ का कण-कण प्रेम से भरा है, जहाँ सांसारिक लेन-देन का कोई स्थान नहीं है, केवल प्रभु की भक्ति का सुख है।

भक्त इस भजन को तब गाते हैं जब वे अपने मन को सांसारिक चिंताओं से मुक्त कर पूर्णतः श्री कृष्ण की शरण में समर्पित करना चाहते हैं। यह भजन विशेष रूप से ब्रज की भक्ति और संतों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए गाया जाता है। सूरदास जी कहते हैं कि वृंदावन की इस पावन भूमि की तुलना कल्पवृक्ष या कामधेनु से भी नहीं की जा सकती, क्योंकि यहाँ मिलने वाला प्रेम और प्रभु का सानिध्य दुर्लभ है। इसे गाने से मन में सात्विक भाव जागृत होते हैं और भक्त को ब्रज के प्रति अटूट प्रेम की प्राप्ति होती है।

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