Krishna

Chhodo Na Kanha

छोड़ो न कान्हा

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यहीं चलाएँ · Play here
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राधा के संग नन्दलाला, वृन्दावन में रास रचा रहा। राधा श्याम न मना रही श्याम माने न राधा का कहा ॥ दोहा छोड़ो न मुझे कान्हा, छोड़ो न नन्दलाला। छोड़ो मेरी बैंया मारेगी मुझे मैया ॥ टेक ॥ छोड़ो ना मुझे कन्हैया, कहीं आ ना जाये मैया। मैया जो आ गयी तो डूबेगी मेरी नैया ॥ ओ कुञ्ज के बिहारी, तू बात मान म्हारी। कहीं बाबा आ गये तो, खैर न होगी तिहारी ॥1॥ तेरी बंशी है प्यारी, सुध खो दीन्ही सारी। राधा हो गयी मतवाली अब तो छोड़ गिरधारी ॥ मौसम है सुहाना दिल है मेरा दिवाना। अब तो हो गया 'मनोज' तेरा राधा ये कान्हा ॥2॥

✍️ रचयिता: मनोज

इस भजन के बारे में

यह भजन राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम और उनकी मनमोहक छेड़छाड़ को अत्यंत सरलता और मधुरता से दर्शाता है। इसमें राधा, कृष्ण से अपनी बाँह छोड़ने का मनुहार कर रही हैं, क्योंकि उन्हें अपनी मैया (माँ) और बाबा (पिता) के आने का भय है। यह भजन राधा-कृष्ण के बीच के उस मीठे रूठने-मनाने और प्रेम भरे तकरार को दर्शाता है, जो उनकी लीलाओं का अभिन्न अंग है।

यह भजन विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण और उनकी प्रिय राधा रानी को समर्पित है। इसमें कृष्ण की बंसी की मोहिनी धुन और राधा के उन पर पूर्ण समर्पण का भी वर्णन है। यह राधा-कृष्ण के शाश्वत प्रेम और उनकी बाल लीलाओं की झाँकी प्रस्तुत करता है, जहाँ प्रेम, शरारत और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

भक्त इस भजन को अक्सर उत्सवों, विशेषकर जन्माष्टमी, राधाष्टमी और फाग जैसे त्योहारों पर गाते हैं। इसे गाते समय भक्तों के मन में राधा-कृष्ण के प्रति गहरा प्रेम और भक्ति का भाव उमड़ आता है। यह भजन मन को शांति और आनंद प्रदान करता है, और भक्तों को राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं से जोड़कर उन्हें भक्तिमय वातावरण में लीन कर देता है। इसे गाने से मन प्रफुल्लित होता है और राधा-कृष्ण के प्रति आस्था और प्रेम और भी गहरा होता है।

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