Krishna

Banke Bihari Tere Nainon Se

बांके बिहारी तेरे नैनों से

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बांके बिहारी तेरे नैनों से मेरे नैना उलझ गये। मैं तो गई थी दर्शन करने हां दर्शन करने। मोर मुकुट छवि देख के मेरे नैना उलझ गये ॥ टेक ॥ मैं तो गई थी कुंज भवन में हां कुंज भवन में। तेरी युगल छवि देख के मेरे नैना उलझ गये ॥1॥ मैं तो गई थी सेवा कुंज में हां सेवा कुंज में। तेरी रासलीला देख के मेरे नैना उलझ गये ॥2॥ मैं तो गई थी बरसाने में हां बरसाने में। तेरी राधा की छवि देख के मेरे नैना उलझ गये ॥3॥ मैं तो गई थी गोवर्धन में हां गोवर्धन में। तेरी गोवर्धन विधि देख के मेरे नैना उलझ गये ॥4॥

इस भजन के बारे में

यह प्यारा भजन बांके बिहारी जी के अद्भुत और मनमोहक रूप को समर्पित है। इसका भावार्थ यह है कि भक्त जब भगवान के दर्शन करने जाता है, तो उनकी छवि इतनी सुंदर होती है कि भक्त की आँखें उन्हीं में खो जाती हैं। बांके बिहारी जी का मोर मुकुट और उनकी तिरछी चितवन भक्त के मन को पूरी तरह से मोह लेती है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि ईश्वर की भक्ति में डूब जाने के बाद भक्त को संसार की कोई और वस्तु आकर्षित नहीं करती, उसका ध्यान केवल अपने आराध्य की सुंदरता में ही लगा रहता है।

यह भजन मुख्य रूप से श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रेम और उनकी लीलाओं को दर्शाता है। भक्त इसे तब गाते हैं जब वे प्रभु के प्रति अपना समर्पण व्यक्त करना चाहते हैं या जब उनका मन भक्ति के आनंद में सराबोर होता है। इसे अक्सर कीर्तन, सत्संग या घर में पूजा के समय गाया जाता है। इस भजन को गाने से मन को असीम शांति मिलती है और ऐसा अनुभव होता है जैसे हम स्वयं वृंदावन की कुंज गलियों में प्रभु के साथ विहार कर रहे हों। यह भजन मन को चंचल संसार से हटाकर प्रभु के चरणों में स्थिर करने का एक सुंदर माध्यम है।

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