Yuddh ke Baad Dhwaja se Utarte Hi Rath ka Bhasm Hona

युद्ध के बाद ध्वजा से उतरते ही रथ का भस्म होना

Yuddh ke Baad Dhwaja se Utarte Hi Rath ka Bhasm Hona

महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। अठारह दिनों तक चली उस भीषण रणभूमि में धर्म की विजय हुई और कौरव सेना का अंत हो गया। विजयी अर्जुन अपने दिव्य रथ पर सवार थे, जिसके सारथी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे और जिसकी ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान थे। युद्ध की समाप्ति पर अर्जुन के मन में फिर से एक सूक्ष्म गर्व उठा — उन्हें लगा कि इस महाविजय का श्रेय उनके पराक्रम और उनके गांडीव धनुष को है।

जब रथ शिविर के समीप पहुँचा, तो अर्जुन ने चाहा कि पहले वे स्वयं उतरकर, फिर सारथी श्रीकृष्ण को उतारें, जैसा कि सामान्य रीति थी। परन्तु श्रीकृष्ण ने कहा — "नहीं अर्जुन, इस बार तुम पहले उतरो, मैं बाद में उतरूँगा।" अर्जुन को यह बात असामान्य लगी, पर प्रभु की आज्ञा मानकर वे रथ से नीचे उतर गए। तभी हनुमान जी भी ध्वजा से उतरकर अंतर्ध्यान हो गए। और श्रीकृष्ण के रथ से उतरते ही एक अद्भुत घटना घटी।

रथ से श्रीकृष्ण के पैर उतारते ही अचानक वह पूरा रथ भड़भड़ाकर आग की लपटों में घिर गया और क्षण भर में जलकर भस्म हो गया — जैसे किसी ने उस पर अग्नि उँडेल दी हो। अर्जुन यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। जो रथ अठारह दिनों के महायुद्ध में असंख्य दिव्य अस्त्रों को सहकर भी अडिग खड़ा रहा, वही रथ अब बिना किसी शत्रु के, स्वयं ही राख में बदल गया — यह कैसे संभव हुआ!

अर्जुन ने विस्मित होकर श्रीकृष्ण से इसका कारण पूछा। तब श्रीकृष्ण ने मुसकराकर कहा — "हे पार्थ! तुम्हारा यह रथ तो युद्ध के आरम्भ में ही भीष्म, द्रोण और कर्ण के ब्रह्मास्त्र तथा दिव्य अस्त्रों के प्रहार से भस्म होने योग्य हो चुका था। परन्तु यह अब तक इसलिए अक्षत खड़ा रहा क्योंकि इसकी ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान थे और सारथी के रूप में मैं इसे थामे हुए था। जब तक हम दोनों इस पर थे, कोई शक्ति इसे नष्ट नहीं कर सकती थी। अब जब कार्य पूरा हो गया और हम उतर गए, तो इसने अपना अस्तित्व त्याग दिया।"

यह सुनकर अर्जुन का समस्त अभिमान चूर हो गया। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे और वे श्रीकृष्ण तथा अंतर्ध्यान हुए हनुमान जी दोनों के प्रति नतमस्तक हो गए। उन्होंने समझ लिया कि इस महाविजय के पीछे उनका पराक्रम गौण था; असली रक्षक तो प्रभु श्रीकृष्ण और वायुपुत्र हनुमान जी की कृपा थी। जो श्रेय वे स्वयं को दे रहे थे, वह वस्तुतः उन दिव्य शक्तियों का था जो अदृश्य रहकर उनकी रक्षा कर रही थीं।

अर्जुन ने हाथ जोड़कर कृतज्ञता से कहा — "हे प्रभु! मैं तो निमित्त मात्र था; कर्ता तो आप ही हैं। मेरा गांडीव, मेरे बाण, मेरा बल — सब आपकी ही कृपा के आश्रित हैं।" इस प्रकार युद्ध के अंत में अर्जुन का अंतिम अभिमान भी भंग हो गया और उनके हृदय में शुद्ध भक्ति एवं समर्पण की ज्योति प्रज्वलित हो उठी।

इस कथा का भाव यही है — जिस कर्म में हमें अपना पराक्रम दिखता है, वहाँ भी वास्तव में प्रभु की कृपा और भक्तों का आश्रय ही रक्षा करता है; सच्चा भक्त वही है जो विजय का श्रेय स्वयं न लेकर प्रभु के चरणों में अर्पित कर दे।

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